भगवान श्रीकृष्ण उपदेश

श्रीमद्भगवद्गीता (Srimad Bhagavad Gita)

महाभारत के भीष्म पर्व का वह दिव्य उपदेश, जो भगवान श्रीकृष्ण ने कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में मोहग्रस्त अर्जुन को दिया था। यह समस्त उपनिषदों का सार, कर्म, ज्ञान और भक्ति का सनातन महाग्रंथ है।

✨ आज का पावन गीता श्लोक ✨
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥
भावार्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और तुम्हारी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो। (अध्याय २, श्लोक ४७)

सम्पूर्ण १८ अध्यायों का विवरण

अध्याय १

अध्याय १: अर्जुनविषादयोग

Arjuna Vishada Yoga • 47 श्लोक

कुरुक्षेत्र के रणक्षेत्र में अर्जुन का मोह, करुणा और धर्मसंकट

अध्याय २

अध्याय २: सांख्ययोग

Sankhya Yoga • 72 श्लोक

आत्मा की अमरता, निष्काम कर्मयोग एवं स्थितप्रज्ञ के दिव्य लक्षण

अध्याय ३

अध्याय ३: कर्मयोग

Karma Yoga • 43 श्लोक

निःस्वार्थ कर्म, यज्ञ भावना और समाज कल्याण (लोकसंग्रह)

अध्याय ४

अध्याय ४: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग

Jnana Karma Sanyasa Yoga • 42 श्लोक

ईश्वरीय अवतार का दिव्य रहस्य एवं ज्ञान रूपी अग्नि से कर्मों का दहन

अध्याय ५

अध्याय ५: कर्मसंन्यासयोग

Karma Sanyasa Yoga • 29 श्लोक

संन्यास और कर्मयोग का समन्वय, आत्मसंयम और परम शांति

अध्याय ६

अध्याय ६: ध्यानयोग (आत्मसंयम योग)

Dhyana Yoga • 47 श्लोक

मन की एकाग्रता, अष्टांग योग साधना, ध्यान विधि और योगभ्रष्ट की सद्गति

अध्याय ७

अध्याय ७: ज्ञानविज्ञानयोग

Jnana Vijnana Yoga • 30 श्लोक

भगवान की परा और अपरा प्रकृति तथा चार प्रकार के भक्तों का रहस्य

अध्याय ८

अध्याय ८: अक्षरब्रह्मयोग

Akshara Brahma Yoga • 28 श्लोक

अंतकाल में प्रभु स्मरण, ॐ की महत्ता एवं जन्म-मरण चक्र से मुक्ति

अध्याय ९

अध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोग

Raja Vidya Raja Guhya Yoga • 34 श्लोक

समस्त विद्याओं का राजा, परम गोपनीय ज्ञान एवं अनन्य भक्ति की महिमा

१०
अध्याय १०

अध्याय १०: विभूतियोग

Vibhuti Yoga • 42 श्लोक

सृष्टि के कण-कण में परमात्मा के ऐश्वर्य और दिव्य विभूतियों का दर्शन

११
अध्याय ११

अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग

Vishwaroopa Darshana Yoga • 55 श्लोक

भगवान श्रीकृष्ण का अलौकिक विराट ब्रह्मांडीय स्वरूप दर्शन

१२
अध्याय १२

अध्याय १२: भक्तियोग

Bhakti Yoga • 20 श्लोक

सगुण और निर्गुण भक्ति, भगवान के प्रिय भक्त के श्रेष्ठ सद्गुण

१३
अध्याय १३

अध्याय १३: क्षेत्रक्षेत्रज्ञविभागयोग

Kshetra Kshetrajna Vibhaga Yoga • 34 श्लोक

शरीर (क्षेत्र) और आत्मा/परमात्मा (क्षेत्रज्ञ) का यथार्थ भेद

१४
अध्याय १४

अध्याय १४: गुणत्रयविभागयोग

Gunatraya Vibhaga Yoga • 27 श्लोक

सत्व, रज और तम तीनों गुणों का विश्लेषण एवं गुणातीत अवस्था

१५
अध्याय १५

अध्याय १५: पुरुषोत्तमयोग

Purushottama Yoga • 20 श्लोक

संसार रूपी उल्टा अश्वत्थ वृक्ष, क्षर, अक्षर और पुरुषोत्तम स्वरूप

१६
अध्याय १६

अध्याय १६: दैवासुरसम्पद्विभागयोग

Daivasura Sampad Vibhaga Yoga • 24 श्लोक

दैवी संपदा (सद्गुण) और आसुरी संपदा (दुर्गुण) का भेद

१७
अध्याय १७

अध्याय १७: श्रद्धात्रयविभागयोग

Shraddhatraya Vibhaga Yoga • 28 श्लोक

श्रद्धा के तीन प्रकार, आहार, यज्ञ, तप, दान एवं ॐ तत्सत् की महिमा

१८
अध्याय १८

अध्याय १८: मोक्षसंन्यासयोग

Moksha Sanyasa Yoga • 78 श्लोक

त्याग और संन्यास का अंतिम निष्कर्ष, संपूर्ण शरणागति एवं परम मोक्ष