श्रीमद्भगवद्गीता
कुल श्लोक: 20
अध्याय १२: भक्तियोग
Bhakti Yoga
मूल विषय: सगुण और निर्गुण भक्ति, भगवान के प्रिय भक्त के श्रेष्ठ सद्गुण
अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि
द्वादश अध्याय भक्ति का सर्वोत्तम ग्रंथ है। अर्जुन पूछते हैं कि साकार सगुण उपासक श्रेष्ठ हैं या निराकार निर्गुण उपासक। श्रीकृष्ण बताते हैं कि दोनों ही मुझे प्राप्त होते हैं, किन्तु देहधारियों के लिए सगुण रूप सुगम है। इसके उपरांत प्रभु अपने अति प्रिय भक्त के ३५ दिव्य सद्गुणों का वर्णन करते हैं।
अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक
श्लोक संग्रह #1
संस्कृत मूल
मय्यावेश्य मनो ये मां नित्ययुक्ता उपासते।
श्रद्धया परयोपेतास्ते मे युक्ततमा मताः॥ (१२.२)
हिंदी भावार्थ: जो अनन्य श्रद्धा से युक्त होकर अपने मन को मुझमें एकाग्र करके निरंतर मेरा भजन करते हैं, वे मुझे परम श्रेष्ठ योगी मान्य हैं।
श्लोक संग्रह #2
संस्कृत मूल
अद्वेष्टा सर्वभूतानां मैत्रः करुण एव च।
निर्ममो निरहङ्कारः समदुःखसुखः क्षमी॥ (१२.१३)
हिंदी भावार्थ: जो किसी भी प्राणी से द्वेष नहीं करता, सबका मित्र और दयालु है, ममता और अहंकार से रहित है, सुख-दुःख में समान और क्षमावान है—वह भक्त मुझे अत्यंत प्रिय है।
दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख
- • सच्ची भक्ति दूसरों के प्रति करुणा, मित्रता और क्षमा में प्रकट होती है।
- • सुख-दुःख, मान-अपमान और निंदा-स्तुति में शांत रहना ही भक्त का सच्चा आभूषण है।
- • ईश्वर को वही प्रिय है जिसका मन किसी को उद्वेग नहीं देता और जो स्वयं किसी से उद्विग्न नहीं होता।
अन्य पावन स्तुति एवं पाठ
श्री हनुमान चालीसा
संकटमोचन श्री हनुमान
बल, बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान जी की पावन चालीसा का नित्य पाठ।
श्री राम चंद्र कृपालु भजु मन
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अनुपम श्रीराम स्तुति।


