श्रीमद्भगवद्गीता
कुल श्लोक: 29
अध्याय ५: कर्मसंन्यासयोग
Karma Sanyasa Yoga
मूल विषय: संन्यास और कर्मयोग का समन्वय, आत्मसंयम और परम शांति
अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि
पंचम अध्याय में श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कर्मयोग और ज्ञानयोग वस्तुतः एक ही लक्ष्य तक पहुंचाते हैं। जो व्यक्ति कर्मफल को ईश्वर को समर्पित करके कर्म करता है, वह जल में कमल के पत्ते की भांति पाप से अलिप्त रहता है।
अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक
श्लोक संग्रह #1
संस्कृत मूल
ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः।
लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा॥ (५.१०)
हिंदी भावार्थ: जो पुरुष सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके और आसक्ति को त्यागकर कर्म करता है, वह जल में कमल के पत्ते के समान पाप से लिप्त नहीं होता।
श्लोक संग्रह #2
संस्कृत मूल
विद्याविनयसम्पन्ने ब्राह्मणे गवि हस्तिनि।
शुनि चैव श्वपाके च पण्डिताः समदर्शिनः॥ (५.१८)
हिंदी भावार्थ: ज्ञानी महापुरुष विद्या और विनययुक्त ब्राह्मण में तथा गाय, हाथी, कुत्ते और चांडाल में भी समदर्शी (परमात्मा रूप) होते हैं।
दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख
- • समदर्शिता ही ज्ञान की पराकाष्ठा है; सभी जीवों में एक ही चेतना का दर्शन करें।
- • बाहरी विषयों के त्याग से अधिक महत्वपूर्ण है मन के भीतर से आसक्ति का त्याग।
- • परम शांति केवल वही पाता है जो राग-द्वेष और क्रोध से सर्वथा मुक्त हो चुका है।
अन्य पावन स्तुति एवं पाठ
श्री हनुमान चालीसा
संकटमोचन श्री हनुमान
बल, बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान जी की पावन चालीसा का नित्य पाठ।
श्री राम चंद्र कृपालु भजु मन
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अनुपम श्रीराम स्तुति।


