भगवान श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता कुल श्लोक: 55

अध्याय ११: विश्वरूपदर्शनयोग

Vishwaroopa Darshana Yoga

मूल विषय: भगवान श्रीकृष्ण का अलौकिक विराट ब्रह्मांडीय स्वरूप दर्शन

अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि

एकादश अध्याय गीता का अत्यंत भव्य और रोमांचक अध्याय है। अर्जुन की प्रार्थना पर भगवान श्रीकृष्ण उन्हें दिव्य दृष्टि प्रदान करते हैं और अपना अनंतकोटि ब्रह्मांडीय विश्वरूप दिखाते हैं। इस रूप में करोड़ों सूर्य, ब्रह्मा-शिव सहित समस्त देवता, नक्षत्र और संहारकारी काल रूप दिखाई देता है। अर्जुन भयभीत होकर स्तुति करते हैं।

अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक

श्लोक संग्रह #1 संस्कृत मूल
दिवि सूर्यसहस्रस्य भवेद्युगपदुत्थिता। यदि भाः सदृशी सा स्याद्भासस्तस्य महात्मनः॥ (११.१२)
हिंदी भावार्थ: आकाश में एक साथ एक हजार सूर्यों के उदय होने से जो प्रकाश उत्पन्न हो, वह भी उस विश्वरूप परमात्मा के तेज के समान शायद ही हो सके।
श्लोक संग्रह #2 संस्कृत मूल
कालोऽस्मि लोकक्षयकृत्प्रवृद्धो लोकान्समाहर्तुमिह प्रवृत्ततः। मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्॥ (११.३२, ३३)
हिंदी भावार्थ: मैं लोकों का नाश करने वाला महाकाल हूँ। ये सभी योद्धा मेरे द्वारा पहले ही मारे जा चुके हैं, हे अर्जुन! तुम केवल निमित्त मात्र बन जाओ।

दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख

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