भगवान श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता कुल श्लोक: 34

अध्याय ९: राजविद्याराजगुह्ययोग

Raja Vidya Raja Guhya Yoga

मूल विषय: समस्त विद्याओं का राजा, परम गोपनीय ज्ञान एवं अनन्य भक्ति की महिमा

अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि

नवम अध्याय को राजविद्या (विद्याओं की रानी) कहा गया है। भगवान श्रीकृष्ण अपनी सर्वव्यापकता, जगत की उत्पत्ति-प्रलय और निष्काम अनन्य भक्ति की महिमा का वर्णन करते हैं। वे अभय वचन देते हैं कि प्रेम से अर्पित एक पत्ता या जल भी वे सहर्ष स्वीकार करते हैं।

अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक

श्लोक संग्रह #1 संस्कृत मूल
अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते। तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥ (९.२२)
हिंदी भावार्थ: जो अनन्य भक्त केवल मेरा ही चिंतन करते हुए निष्काम भाव से मुझे भजते हैं, उन नित्य युक्त भक्तों के योग-क्षेम का वहन मैं स्वयं करता हूँ।
श्लोक संग्रह #2 संस्कृत मूल
पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति। तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥ (९.२६)
हिंदी भावार्थ: जो कोई भक्त मेरे लिए प्रेमपूर्वक पत्र, पुष्प, फल अथवा जल भेंट करता है, उस शुद्ध हृदय भक्त द्वारा प्रेम से अर्पित उपहार को मैं सहर्ष स्वीकार करता हूँ।

दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख

← अध्याय 8: Akshara Brahma Yoga 📖 गीता सूची अध्याय 10: Vibhuti Yoga →

अन्य पावन स्तुति एवं पाठ

श्री हनुमान चालीसा चालीसा

श्री हनुमान चालीसा

संकटमोचन श्री हनुमान

बल, बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान जी की पावन चालीसा का नित्य पाठ।

महामृत्युंजय मंत्र मंत्र

महामृत्युंजय मंत्र

भगवान शिव

अकाल मृत्यु निवारण एवं आरोग्य प्रदाता पावन शिव महामंत्र।

श्री रामचंद्र कृपालु भजु मन आरती

श्री राम चंद्र कृपालु भजु मन

मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम

गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अनुपम श्रीराम स्तुति।