भगवान श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता कुल श्लोक: 28

अध्याय १७: श्रद्धात्रयविभागयोग

Shraddhatraya Vibhaga Yoga

मूल विषय: श्रद्धा के तीन प्रकार, आहार, यज्ञ, तप, दान एवं ॐ तत्सत् की महिमा

अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि

सत्रहवें अध्याय में मनुष्य के स्वभाव के अनुसार सात्विक, राजसिक और तामसिक श्रद्धा का वर्णन है। आहार, यज्ञ, तप (शरीर, वाणी और मन का तप) और दान के भेदों को समझाया गया है। अध्याय का समापन 'ॐ तत्सत्' महामंत्र के अर्थ और उसके प्रयोग की पावन महिमा से होता है।

अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक

श्लोक संग्रह #1 संस्कृत मूल
श्रद्धामयोऽयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥ (१७.३)
हिंदी भावार्थ: प्रत्येक मनुष्य की श्रद्धा उसके अंतःकरण के अनुरूप होती है। यह मनुष्य श्रद्धामय है, जिसकी जैसी श्रद्धा होती है, वह स्वयं भी वैसा ही बन जाता है।
श्लोक संग्रह #2 संस्कृत मूल
अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत्। स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥ (१७.१५)
हिंदी भावार्थ: जो उद्वेग न करने वाला, सत्य, प्रिय और हितकारी भाषण है तथा जो स्वाध्याय का अभ्यास है—वही वाणी का तप कहलाता है।

दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख

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