श्रीमद्भगवद्गीता
कुल श्लोक: 42
अध्याय ४: ज्ञानकर्मसंन्यासयोग
Jnana Karma Sanyasa Yoga
मूल विषय: ईश्वरीय अवतार का दिव्य रहस्य एवं ज्ञान रूपी अग्नि से कर्मों का दहन
अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि
चतुर्थ अध्याय में भगवान अवतार लेने के उद्देश्य को स्पष्ट करते हैं। वे बताते हैं कि कर्म करते हुए भी ज्ञान की अग्नि से कर्म बंधनों को कैसे भस्म किया जा सकता है। गुरु की शरण में जाकर विनम्रतापूर्वक ज्ञान प्राप्त करने की महत्ता बताई गई है।
अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक
श्लोक संग्रह #1
संस्कृत मूल
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥ (४.७)
हिंदी भावार्थ: हे भारत! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं धर्म की पुनः स्थापना हेतु अपने स्वरूप को प्रकट करता हूँ।
श्लोक संग्रह #2
संस्कृत मूल
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
तत्स्वयं योगसंसिद्धः कालेनात्मनि विन्दति॥ (४.३८)
हिंदी भावार्थ: इस संसार में ज्ञान के समान पवित्र करने वाला निश्चय ही कुछ भी नहीं है। उस ज्ञान को कर्मयोग में सिद्ध हुआ मनुष्य स्वयं अपने अंतःकरण में पाता है।
दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख
- • सच्चा ज्ञान वही है जो अंतःकरण को अहंकार और संशय से मुक्त करे।
- • सद्गुरु के चरणों में समर्पण, सेवा और जिज्ञासा से ही परम सत्य उद्घाटित होता है।
- • संशयग्रस्त मनुष्य का न यह लोक सुधरता है और न परलोक (संशयात्मा विनश्यति)।
अन्य पावन स्तुति एवं पाठ
श्री हनुमान चालीसा
संकटमोचन श्री हनुमान
बल, बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान जी की पावन चालीसा का नित्य पाठ।
श्री राम चंद्र कृपालु भजु मन
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अनुपम श्रीराम स्तुति।


