भगवान श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता कुल श्लोक: 30

अध्याय ७: ज्ञानविज्ञानयोग

Jnana Vijnana Yoga

मूल विषय: भगवान की परा और अपरा प्रकृति तथा चार प्रकार के भक्तों का रहस्य

अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि

सातवें अध्याय में श्रीकृष्ण अपनी परा (आध्यात्मिक) और अपरा (भौतिक) प्रकृति का रहस्य समझाते हैं। वे चार प्रकार के भक्तों - आर्त (दुःखी), अर्थार्थी (इच्छावान), जिज्ञासु (सत्य खोजी) और ज्ञानी का वर्णन करते हैं, जिनमें निष्काम ज्ञानी भक्त प्रभु को सर्वाधिक प्रिय है।

अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक

श्लोक संग्रह #1 संस्कृत मूल
चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन। आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ॥ (७.१६)
हिंदी भावार्थ: हे भरतवंशियों में श्रेष्ठ अर्जुन! उत्तम कर्म करने वाले चार प्रकार के भक्त मुझे भजते हैं—आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी।
श्लोक संग्रह #2 संस्कृत मूल
बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते। वासुदेवः सर्वमिति स महात्मा सुदुर्लभः॥ (७.१९)
हिंदी भावार्थ: अनेक जन्मों के अंत में तत्वज्ञानी पुरुष सब कुछ वासुदेव (परमात्मा) ही है—ऐसा मानकर मेरी शरण में आता है, ऐसा महात्मा अत्यंत दुर्लभ है।

दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख

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