श्रीमद्भगवद्गीता
कुल श्लोक: 47
अध्याय ६: ध्यानयोग (आत्मसंयम योग)
Dhyana Yoga
मूल विषय: मन की एकाग्रता, अष्टांग योग साधना, ध्यान विधि और योगभ्रष्ट की सद्गति
अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि
छठे अध्याय में मन को नियंत्रित करने, ध्यान लगाने के व्यावहारिक नियम, आसन, प्राणायाम तथा एकाग्रता की विधि विस्तार से समझाई गई है। मन को वश में करने हेतु निरंतर अभ्यास और वैराग्य को अचूक साधन बताया गया है।
अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक
श्लोक संग्रह #1
संस्कृत मूल
उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः॥ (६.५)
हिंदी भावार्थ: मनुष्य को चाहिए कि वह अपने द्वारा अपना उद्धार करे, अपना पतन न होने दे; क्योंकि मनुष्य स्वयं ही अपना मित्र है और स्वयं ही अपना शत्रु है।
श्लोक संग्रह #2
संस्कृत मूल
असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहं चलम्।
अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते॥ (६.३५)
हिंदी भावार्थ: हे महाबाहो! निःसंदेह मन चंचल और कठिनता से वश में होने वाला है, किन्तु हे कुंतीपुत्र! यह निरंतर अभ्यास और वैराग्य से वश में हो जाता है।
दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख
- • मन जब वश में हो तो सबसे बड़ा मित्र है, और अनियंत्रित हो तो सबसे बड़ा शत्रु।
- • अति आहार या पूर्ण उपवास दोनों योग में बाधक हैं; युक्त आहार-विहार ही साधना की कुंजी है।
- • सच्चा योगी वही है जो अन्य सभी प्राणियों के सुख-दुःख को अपने सुख-दुःख के समान समझता है।
अन्य पावन स्तुति एवं पाठ
श्री हनुमान चालीसा
संकटमोचन श्री हनुमान
बल, बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान जी की पावन चालीसा का नित्य पाठ।
श्री राम चंद्र कृपालु भजु मन
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अनुपम श्रीराम स्तुति।


