श्रीमद्भगवद्गीता
कुल श्लोक: 42
अध्याय १०: विभूतियोग
Vibhuti Yoga
मूल विषय: सृष्टि के कण-कण में परमात्मा के ऐश्वर्य और दिव्य विभूतियों का दर्शन
अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि
दशम अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण अपनी प्रमुख विभूतियों का रहस्य प्रकट करते हैं। वे बताते हैं कि समस्त ज्योतियों में सूर्य, नक्षत्रों में चंद्रमा, वेदों में सामवेद, इंद्रियों में मन, पर्वतों में हिमालय और नदियों में वे पावन गंगा हैं। संसार में जो कुछ भी ऐश्वर्यवान और प्रभावशाली है, वह सब उनके ही तेज का अंश है।
अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक
श्लोक संग्रह #1
संस्कृत मूल
अहमात्मा गुडाकेश सर्वभूताशयस्थितः।
अहमादिश्च मध्यं च भूतानामन्त एव च॥ (१०.२०)
हिंदी भावार्थ: हे गुडाकेश (अर्जुन)! मैं समस्त प्राणियों के हृदय में स्थित आत्मा हूँ तथा सब भूतों का आदि, मध्य और अंत भी मैं ही हूँ।
श्लोक संग्रह #2
संस्कृत मूल
यद्यद्विभूतिमत्सत्त्वं श्रीमदूर्जितमेव वा।
तत्तदेवावगच्छ त्वं मम तेजोऽंशसम्भवम्॥ (१०.४१)
हिंदी भावार्थ: जो-जो भी ऐश्वर्ययुक्त, कांतियुक्त और शक्ति संपन्न वस्तु या प्राणी है, उसे तुम मेरे ही तेज के अंश से उत्पन्न समझो।
दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख
- • प्रकृति और जीवन की हर सुंदरता और विशेषता में परमात्मा का ही साक्षात दर्शन करें।
- • संसार के प्रति सम्मान का भाव रखें क्योंकि प्रत्येक जीव में ईश्वर का वास है।
- • अहंकार से बचें; हमारी हर योग्यता और प्रतिभा परमात्मा की ही दी हुई विभूति है।
अन्य पावन स्तुति एवं पाठ
श्री हनुमान चालीसा
संकटमोचन श्री हनुमान
बल, बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान जी की पावन चालीसा का नित्य पाठ।
श्री राम चंद्र कृपालु भजु मन
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अनुपम श्रीराम स्तुति।


