श्रीमद्भगवद्गीता
कुल श्लोक: 43
अध्याय ३: कर्मयोग
Karma Yoga
मूल विषय: निःस्वार्थ कर्म, यज्ञ भावना और समाज कल्याण (लोकसंग्रह)
अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि
तृतीय अध्याय में भगवान श्रीकृष्ण स्पष्ट करते हैं कि कोई भी मनुष्य एक क्षण के लिए भी बिना कर्म किए नहीं रह सकता। संन्यास का अर्थ कर्म छोड़ना नहीं, बल्कि कर्तापन के अहंकार और आसक्ति को त्यागकर लोककल्याण हेतु श्रेष्ठ कर्म करना है।
अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक
श्लोक संग्रह #1
संस्कृत मूल
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरोजनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (३.२१)
हिंदी भावार्थ: श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करते हैं, अन्य साधारण मनुष्य भी वैसा ही आचरण करते हैं। वे जो आदर्श स्थापित करते हैं, समस्त संसार उसका अनुसरण करता है।
श्लोक संग्रह #2
संस्कृत मूल
मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा।
निराशीर्निर्ममो भूत्वा युध्यस्व विगतज्वरः॥ (३.३०)
हिंदी भावार्थ: अपने समस्त कर्मों को मुझमें समर्पित करके, आशारहित, ममतारहित और संताप रहित होकर अपने कर्तव्य का पालन करो।
दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख
- • अपने स्वधर्म का पालन परधर्म के पालन से कहीं अधिक श्रेयस्कर है।
- • सृष्टि का चक्र पारस्परिकता और यज्ञ भावना (सहयोग) पर टिका है।
- • इंद्रियों, मन और बुद्धि को संयमित करके काम-क्रोध रूपी महाशत्रु पर विजय प्राप्त करें।
अन्य पावन स्तुति एवं पाठ
श्री हनुमान चालीसा
संकटमोचन श्री हनुमान
बल, बुद्धि और विद्या के दाता श्री हनुमान जी की पावन चालीसा का नित्य पाठ।
श्री राम चंद्र कृपालु भजु मन
मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम
गोस्वामी तुलसीदास जी द्वारा रचित अनुपम श्रीराम स्तुति।


