भगवान श्रीकृष्ण
श्रीमद्भगवद्गीता कुल श्लोक: 72

अध्याय २: सांख्ययोग

Sankhya Yoga

मूल विषय: आत्मा की अमरता, निष्काम कर्मयोग एवं स्थितप्रज्ञ के दिव्य लक्षण

अध्याय परिचय एवं पृष्ठभूमि

द्वितीय अध्याय श्रीमद्भगवद्गीता का हृदय माना जाता है। इसमें भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को आत्मा के नित्य, अमर और अविनाशी स्वरूप का बोध कराते हैं। इसके उपरांत निष्काम कर्मयोग का मार्ग तथा एक स्थितप्रज्ञ (शांत एवं स्थिर बुद्धि वाले महापुरुष) के लक्षणों का अनुपम वर्णन किया गया है।

अध्याय के प्रमुख एवं प्रामाणिक श्लोक

श्लोक संग्रह #1 संस्कृत मूल
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि। तथा शरीराणि विहाय जीर्णा-न्यन्यानि संयाति नवानि देही॥ (२.२२)
हिंदी भावार्थ: जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर दूसरे नए वस्त्र धारण कर लेता है, वैसे ही जीवात्मा पुराने शरीरों को छोड़कर नए शरीरों को प्राप्त होती है।
श्लोक संग्रह #2 संस्कृत मूल
कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन। मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥ (२.४७)
हिंदी भावार्थ: तुम्हारा अधिकार केवल कर्म करने में है, उसके फलों में कभी नहीं। इसलिए तुम कर्मफल के हेतु मत बनो और तुम्हारी अकर्मण्यता में भी आसक्ति न हो।

दैनिक जीवन में इस अध्याय की सीख

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