वैभव लक्ष्मी व्रत कथा
पावन व्रत कथा

वैभव लक्ष्मी व्रत कथा

माँ वैभव लक्ष्मी (अष्टलक्ष्मी स्वरूप)
📅 व्रत समय: शुक्रवार (संकल्प अनुसार ११ या २१ शुक्रवार)

🎯 व्रत का उद्देश्य एवं फल

धन, वैभव, सुख, संपत्ति, कर्जमुक्ति एवं पारिवारिक शांति

📖 सम्पूर्ण प्रामाणिक व्रत कथा

शीला और उसके पति की कथा: प्राचीन काल में एक बड़े शहर में अनेक लोग रहते थे। उसी शहर में शीला नाम की एक अत्यंत धार्मिक, सुशीला और संतोषी स्त्री अपने पति के साथ रहती थी। उसका पति भी सदाचारी और परिश्रमी था। उनका गृहस्थ जीवन अत्यंत सुखी था।

किन्तु कुछ समय बाद कुसंगति के प्रभाव में आकर शीला के पति को जुए और मद्यपान की बुरी लत लग गई। वह रातों-रात अमीर बनने के फेर में सारा धन, गहने और संपत्ति गंवा बैठा। घर में दाने-दाने की मोहताजी हो गई। शीला अत्यंत दुःखी रहने लगी, किन्तु उसने प्रभु पर से अपना विश्वास कभी नहीं खोया।

एक शुक्रवार की दोपहर को एक अत्यंत तेजस्वी वृद्धा शीला के द्वार पर आई। शीला ने अत्यंत आदर के साथ उस वृद्धा को घर के भीतर बैठाया और जल पिलाया। उस वृद्धा (जो साक्षात माँ लक्ष्मी का स्वरूप थीं) ने शीला के दुःख को पहचानकर उसे 'वैभव लक्ष्मी व्रत' का सरल विधान बताया। उन्होंने कहा—"हे पुत्री! शुक्रवार के दिन शाम को लाल वस्त्र बिछाकर तांबे या पीतल के लोटे पर कटोरी में सोने या चांदी का आभूषण रखकर, खीर का भोग लगाकर 'श्री यंत्र' और माँ लक्ष्मी के आठों स्वरूपों का ध्यान करो। 11 या 21 शुक्रवार का संकल्प लेकर यह व्रत पूर्ण करो।"

शीला ने अगले ही शुक्रवार से पूर्ण श्रद्धा और नियम से वैभव लक्ष्मी का व्रत प्रारंभ किया। व्रत के प्रभाव से उसके पति की बुद्धि शुद्ध हो गई, उसने जुआ और व्यसन हमेशा के लिए छोड़ दिया और पुनः व्यापार प्रारंभ किया। कुछ ही समय में उनका सारा खोया हुआ वैभव, धन और प्रतिष्ठा वापस लौट आई।

🪔 व्रत पूजा विधि एवं नियम

✨ व्रत उद्यापन विधि

संकल्प के अंतिम शुक्रवार (11वें या 21वें) को 7, 11 या 21 सुहागिन स्त्रियों को वैभव लक्ष्मी व्रत की पुस्तक और खीर का प्रसाद सप्रेम भेंट करें।

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