माँ शैलपुत्री
पर्वतराज हिमालय की पुत्री। वृषभ पर आरूढ़, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल। नवरात्रि का आरंभ इन्हीं के पूजन और घटस्थापना से होता है।
वृषारूढां शूलधरां शैलपुत्रीं यशस्विनीम्॥
आश्विन शुक्ल प्रतिपदा से नवमी · 11 – 19 अक्टूबर 2026 · विजयादशमी (दशहरा) 20 अक्टूबर
नीचे दिए गए तिथि-समय प्रयागराज के अनुसार हैं। अन्य शहरों में इनमें कुछ मिनट का अंतर हो सकता है।
| पर्व | दिनांक | तिथि का समय (प्रयागराज) |
|---|---|---|
| घटस्थापना (नवरात्रि आरंभ) | रविवार, 11 अक्टूबर | प्रतिपदा: 10 अक्टूबर रात्रि 9:21 से 11 अक्टूबर रात्रि 9:33 तक |
| महाअष्टमी (दुर्गा अष्टमी) | 18 अक्टूबर* | अष्टमी: 18 अक्टूबर प्रातः 8:29 से 19 अक्टूबर प्रातः 10:53 तक |
| महानवमी | सोमवार, 19 अक्टूबर | नवमी: 19 अक्टूबर प्रातः 10:53 से 20 अक्टूबर दोपहर 12:52 तक |
| विजयादशमी (दशहरा) | मंगलवार, 20 अक्टूबर | दशमी: 20 अक्टूबर दोपहर 12:52 से 21 अक्टूबर अपराह्न 2:13 तक |
प्रतिपदा तिथि 11 अक्टूबर को पूरे दिन रहेगी। परंतु उसी दिन चित्रा नक्षत्र (रात्रि 10:33 तक) और वैधृति योग (रात्रि 9:05 तक) भी पूरे दिन बने रहेंगे। शास्त्रीय नियम में घटस्थापना के लिए चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग वर्जित माने गए हैं, इसलिए जब ये पूरे दिन रहें तो अभिजित मुहूर्त में कलश स्थापना को सर्वोत्तम माना जाता है। कई पंचांग प्रातःकाल की अवधि भी देते हैं; ऊपर के नियम को देखते हुए अभिजित मुहूर्त का चयन अधिक उपयुक्त है।
नवरात्रि में नवदुर्गा के नौ स्वरूपों का क्रम से पूजन किया जाता है। यह क्रम देवी कवच के उस प्रसिद्ध श्लोक में मिलता है जो “प्रथमं शैलपुत्रीति द्वितीयं ब्रह्मचारिणी” से आरंभ होता है। नीचे दिए ध्यान श्लोक और भोग परंपरागत हैं; क्षेत्र के अनुसार भोग में भिन्नता मिलती है।
पर्वतराज हिमालय की पुत्री। वृषभ पर आरूढ़, दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएँ हाथ में कमल। नवरात्रि का आरंभ इन्हीं के पूजन और घटस्थापना से होता है।
तप और संयम की देवी। दाहिने हाथ में जपमाला और बाएँ हाथ में कमंडलु। भगवान शिव को पति रूप में पाने के लिए की गई कठोर तपस्या का स्वरूप।
मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र। सिंह पर सवार, दस भुजाओं वाला स्वरूप। भय और संकट हरने तथा मन को शांति देने वाली देवी।
मान्यता है कि अपनी मंद मुस्कान से ब्रह्मांड की रचना करने वाली देवी। अष्टभुजा, सिंह पर सवार। इनके तेज से समस्त दिशाएँ आलोकित मानी गई हैं।
कार्तिकेय (स्कन्द) की माता। कमल के आसन पर विराजमान, गोद में बाल स्कन्द। सिंह वाहन। मातृत्व और वात्सल्य का स्वरूप।
महर्षि कात्यायन की पुत्री रूप में प्रकट हुईं। महिषासुर का वध करने वाला रूप। सिंह वाहन। ब्रज की गोपियों द्वारा भी इनकी उपासना का वर्णन मिलता है।
अंधकार और भय का नाश करने वाला उग्र किंतु सदा शुभ फल देने वाला स्वरूप। गर्दभ (गधा) वाहन। इस वर्ष सप्तमी तिथि 17 और 18 अक्टूबर, दोनों दिन सूर्योदय को स्पर्श करती है।
श्वेत वर्ण, वृषभ वाहन। शुद्धता और शांति का स्वरूप। महाअष्टमी पर अनेक घरों में कन्या पूजन किया जाता है। (अष्टमी की तिथि पंचांगों में 18 या 19 अक्टूबर बताई गई है; नीचे देखें।)
सभी सिद्धियाँ प्रदान करने वाली देवी, कमल पर आसीन। नवमी पर हवन और कन्या भोज की परंपरा है। यह नवरात्रि का अंतिम दिन है।
नवरात्रि का समापन। नौ दिन के व्रत का पारण किया जाता है और दशमी तिथि में अपराह्न काल को विजय पूजन का समय माना जाता है। प्रयागराज में दशमी दोपहर 12:52 से लगती है।
पिछले वर्ष शारदीय नवरात्रि 22 सितंबर को आरंभ हुई थी और इस वर्ष 11 अक्टूबर को, यानी पूरे 19 दिन बाद। कारण यह है कि 2026 में ज्येष्ठ का महीना अधिक मास के रूप में दोहराया गया (17 मई से 15 जून), जिससे चंद्र-वर्ष को सौर-वर्ष के साथ बैठाने के लिए सारे पर्व आगे खिसक गए। नवरात्रि हर साल “इस तारीख को” नहीं, “आश्विन शुक्ल प्रतिपदा को” आती है, और प्रतिपदा तय करती है चंद्रमा की चाल।
इसी कारण नौ दिनों की गिनती भी हर बार सीधी नहीं बैठती। इस वर्ष सप्तमी दो सूर्योदयों को छूती है, जबकि अष्टमी और नवमी का संधिकाल 19 अक्टूबर की सुबह पड़ता है। घटस्थापना के दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग दोनों पूरे दिन रहने से शास्त्र हमें अभिजित मुहूर्त की ओर भेजते हैं। यह उलझन नहीं, परंपरा की सूक्ष्मता है: जब सारे नियम एक साथ पूरे न हो सकें, तब सबसे निर्दोष विकल्प कौन-सा है, यह पहले से तय है।
परंपरा में नौ रात्रियों को तीन-तीन के तीन चरणों में भी देखा जाता है: पहले तीन दिन दुर्गा (जड़ता और बुरी प्रवृत्तियों का क्षय), अगले तीन लक्ष्मी (भीतर की संपन्नता का संचय), और अंतिम तीन सरस्वती (विवेक और ज्ञान)। चाहें तो इसे अपने नौ दिनों की रूपरेखा बना लें: पहले चरण में एक आदत छोड़ें, दूसरे में एक अच्छी आदत जोड़ें, और तीसरे में दिनभर का कुछ समय पढ़ने-मनन में लगाएँ।
शारदीय नवरात्रि 2026 रविवार, 11 अक्टूबर (आश्विन शुक्ल प्रतिपदा) से आरंभ होकर 19 अक्टूबर (नवमी) तक चलेगी। विजयादशमी (दशहरा) मंगलवार, 20 अक्टूबर 2026 को है।
प्रतिपदा तिथि 11 अक्टूबर को पूरे दिन (रात्रि लगभग 9:33 बजे तक) रहेगी। उस दिन चित्रा नक्षत्र और वैधृति योग भी पूरे दिन रहने से अभिजित मुहूर्त को सर्वोत्तम माना गया है। प्रयागराज में यह 11:26 AM से 12:13 PM है; दिल्ली में लगभग 11:44 AM से 12:31 PM। अपने शहर का समय इसी पृष्ठ के कैलकुलेटर में देखें।
अष्टमी तिथि 18 अक्टूबर को प्रातः लगभग 8:29 बजे से 19 अक्टूबर को प्रातः लगभग 10:53 बजे तक है (प्रयागराज के अनुसार), और नवमी उसके बाद से 20 अक्टूबर दोपहर लगभग 12:52 बजे तक। इसी कारण कुछ पंचांग महाअष्टमी 18 अक्टूबर को और कुछ 19 अक्टूबर को बताते हैं; महानवमी अधिकांश पंचांगों में 19 अक्टूबर है। अपने स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि कर लें।
परंपरा के अनुसार व्रत में सात्विक फलाहार लिया जाता है: फल, दूध-दही, कुट्टू या सिंघाड़े का आटा, साबूदाना, समा के चावल, आलू और सेंधा नमक। अनाज (गेहूँ-चावल), प्याज-लहसुन तथा मांस-मदिरा का त्याग किया जाता है। क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार नियम थोड़े भिन्न हो सकते हैं।
नहीं। श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार लोग नौ दिन, केवल पहले और अंतिम दिन, अथवा केवल अष्टमी का व्रत रखते हैं। गर्भवती महिलाएँ, वृद्धजन और रोगी अपने स्वास्थ्य को प्राथमिकता दें और आवश्यकता हो तो चिकित्सक की सलाह लें।
तिथि, नक्षत्र, योग और मुहूर्त के समय खगोलीय गणना (लाहिरी अयनांश) से निकाले गए हैं तथा कई स्थापित पंचांगों से मिलान किए गए हैं। फिर भी धार्मिक अनुष्ठान के निर्णय के लिए अपने स्थानीय पंचांग या पुरोहित से पुष्टि अवश्य करें।