संतोषी माता व्रत कथा
पावन व्रत कथा

संतोषी माता व्रत कथा

माँ संतोषी (भगवान गणेश की पुत्री)
📅 व्रत समय: लगातार १६ शुक्रवार

🎯 व्रत का उद्देश्य एवं फल

संताप और क्लेश का नाश, पारिवारिक सुख-शांति एवं मनोवांछित फल

📖 सम्पूर्ण प्रामाणिक व्रत कथा

संतोषी माता का प्राकट्य एवं बहूरानी की कथा: रक्षाबंधन के पावन पर्व पर भगवान श्री गणेश को उनकी बहन मानसा देवी ने राखी बांधी। गणेश जी के दोनों पुत्र शुभ और लाभ ने अपने पिता से कहा—"पिताजी! हमें भी राखी बांधने के लिए एक बहन चाहिए।" तब नारद जी के अनुरोध पर भगवान गणेश ने अपनी रिद्धि-सिद्धि रूपी पत्नियों के साथ अग्नि से एक परम दिव्य, कांतिमान कन्या को प्रकट किया। चूंकि इस कन्या के दर्शन मात्र से सबके हृदय में परम संतोष उत्पन्न हुआ, अतः इसका नाम 'संतोषी माता' पड़ा।

एक बुढ़िया के सात पुत्र थे। छह पुत्र कमाते थे और सातवां कामचोर था। बुढ़िया छहों पुत्रों को अच्छा भोजन कराती और सातवें पुत्र को बचा-खुचा जूठन खिलाती थी। सातवें पुत्र की पत्नी अत्यंत सती-साध्वी और शीलवान थी। जब उस छोटे पुत्र को इस बात का पता चला, तो वह विदेश में व्यापार करने चला गया। पीछे से सास और जेठानियों ने उस बहू पर घोर अत्याचार करना प्रारंभ कर दिया। उसे सूखी लकड़ियां बीनने और भूखे पेट रहने पर विवश किया गया।

एक दिन वन में लकड़ियां चुनते समय उस बहू ने कुछ स्त्रियों को संतोषी माता का व्रत करते देखा। उसने व्रत का नियम—गुड़ और चने का प्रसाद, कथा श्रवण, और खट्टी वस्तु का सर्वथा निषेध—जाना और स्वयं 16 शुक्रवार का व्रत रखने का संकल्प लिया। माता की कृपा से उसके पति को विदेश में अपार धन-संपत्ति मिली और वह शीघ्र ही अपार वैभव के साथ घर लौट आया। जब जेठानियों ने छल से उद्यापन के दिन बच्चों को इमली खिलाकर खटाई दिलवाई, तो राजा के सैनिकों ने उसके पति को बंदी बना लिया। बहू ने पुनः रो-रोकर माता से क्षमा मांगी और दोबारा शुद्ध मन से उद्यापन किया। माता ने प्रसन्न होकर उसके पति को मुक्त कराया और उनके घर को पुत्र-रत्न एवं अखंड आनंद से भर दिया।

🪔 व्रत पूजा विधि एवं नियम

✨ व्रत उद्यापन विधि

16 शुक्रवार पूर्ण होने पर उद्यापन करें। 8 बालकों को खीर, पूरी और चने का सात्विक भोजन कराएं और उन्हें कोई भी खट्टी वस्तु न दें।

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