जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत कथा
🎯 व्रत का उद्देश्य एवं फल
संतान को अकाल मृत्यु और संकटों से रक्षा, यशस्वी जीवन एवं दीर्घायु
📖 सम्पूर्ण प्रामाणिक व्रत कथा
राजा जीमूतवाहन अत्यंत दयालु थे। उन्होंने नागमाता से कहा—"माता! आप विलाप न करें। आपके पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए आज वधशिला पर मैं स्वयं गरुड़ का आहार बनने जाऊंगा।" जीमूतवाहन लाल वस्त्र ओढ़कर वधशिला पर लेट गए। गरुड़ जी आए और उन्हें अपने पंजों में दबाकर पर्वत शिखर पर ले गए। जब गरुड़ ने देखा कि यह प्राणी पीड़ा से कराहने के स्थान पर शांत और प्रसन्न है, तो उन्होंने रुककर परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने सत्य कह सुनाया। गरुड़ जी उनके इस अप्रतिम त्याग और परोपकार से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और वरदान दिया कि वे भविष्य में कभी किसी नाग का शिकार नहीं करेंगे तथा जो माताएं जीमूतवाहन की पूजा करेंगी, उनकी संतान सदा दीर्घायु और संकटमुक्त रहेगी।
चील और सियारिन की पावन कथा: एक वन में नर्मदा नदी के तट पर एक चील और एक सियारिन सहेलियां थीं। दोनों ने वनवासियों को जीवित्पुत्रिका का व्रत करते देखकर स्वयं भी निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया। किन्तु रात्रि में भूख से व्याकुल सियारिन ने चुपके से एक मृत पशु का मांस खाकर अपना व्रत भंग कर लिया, जबकि चील ने पूरी रात भूखी-प्यासी रहकर निष्ठापूर्वक व्रत पूर्ण किया। अगले जन्म में दोनों ने मनुष्य रूप में दो बहनों के रूप में जन्म लिया। व्रत के प्रभाव से चील के सातों पुत्र बलवान, सुंदर और दीर्घायु हुए, जबकि व्रत भंग करने के कारण सियारिन के सभी बच्चे जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। सियारिन ने जब पश्चाताप कर जिउतिया व्रत किया, तब उसके जीवन में भी संतान सुख लौटा।
🪔 व्रत पूजा विधि एवं नियम
- • सप्तमी तिथि की शाम को 'ओठगन' (नहाए-खाए) के साथ सात्विक भोजन किया जाता है।
- • अष्टमी तिथि को सूर्योदय से लेकर अगले दिन नवमी के सूर्योदय तक पूर्ण निर्जला उपवास रखा जाता है।
- • पूजा स्थल पर गोबर और मिट्टी से भगवान जीमूतवाहन, चील और सियारिन की प्रतिमाएं बनाई जाती हैं।
- • सरसों का तेल, खली, जिउतिया का लाल धागा और बांस के पत्तों से पूजन किया जाता है।
- • नवमी के दिन प्रातः सूर्य देव को अर्घ्य देकर और प्रसाद ग्रहण कर पारण किया जाता है।
✨ व्रत उद्यापन विधि
व्रत के उपरांत ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र और फल दान दिया जाता है तथा संतान को अभिमंत्रित जिउतिया का लाल धागा गले में पहनाया जाता है।
अन्य पावन व्रत कथाएं
श्री सत्यनारायण व्रत कथा
स्कन्द पुराण के रेवाखंड से उद्धृत भगवान श्री सत्यनारायण की पावन कथा। इसमें नारद जी की लोककल्याणकारी प्रार्थना पर भगवान विष्णु द्वारा सत्यनारायण व्रत का विधान बताया गया है। शतानंद ब्राह्मण, लकड़हारा, राजा उल्कामुख और साधु वैश्य की कथाएं सत्य और प्रभु भक्ति की महिमा को उजागर करती हैं।
करवा चौथ व्रत कथा
सुहागिन स्त्रियों का सर्वाधिक पावन एवं प्रतिष्ठित निर्जला महाव्रत। इस दिन विवाहित महिलाएं अपने पति की लंबी आयु और सुख-समृद्धि के लिए पूरे दिन निर्जला उपवास रखती हैं और रात्रि में चंद्रमा को अर्घ्य देकर व्रत खोलती हैं।
सम्पूर्ण एकादशी व्रत कथा व महात्म्य
पद्म पुराण में वर्णित एकादशी देवी की उत्पत्ति और एकादशी व्रत का सर्वोच्च महात्म्य। वर्ष की सभी 24 एकादशियों (निर्जला, देवशयनी, देवउठनी, उत्पन्ना आदि) में भगवान विष्णु की पूजा और अन्न त्याग का विधान है।


