जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत कथा
पावन व्रत कथा

जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) व्रत कथा

भगवान जीमूतवाहन, चील एवं सियारिन
📅 व्रत समय: आश्विन कृष्ण पक्ष अष्टमी

🎯 व्रत का उद्देश्य एवं फल

संतान को अकाल मृत्यु और संकटों से रक्षा, यशस्वी जीवन एवं दीर्घायु

📖 सम्पूर्ण प्रामाणिक व्रत कथा

राजा जीमूतवाहन का आत्मबलिदान: गंधर्वों के धर्मात्मा राजा जीमूतवाहन ने अपने युवावस्था में ही राजपाट छोड़कर वन में पिता की सेवा करने का निश्चय किया। वन में भ्रमण करते हुए उन्होंने एक वृद्ध नागमाता (शंखचूड़ की माता) को फूट-फूटकर रोते देखा। पूछने पर नागमाता ने बताया कि पक्षीराज गरुड़ से हुए समझौते के अनुसार प्रतिदिन एक नाग गरुड़ का भोजन बनने वधशिला पर जाता है। आज मेरे इकलौते पुत्र शंखचूड़ की बारी है।

राजा जीमूतवाहन अत्यंत दयालु थे। उन्होंने नागमाता से कहा—"माता! आप विलाप न करें। आपके पुत्र के प्राणों की रक्षा के लिए आज वधशिला पर मैं स्वयं गरुड़ का आहार बनने जाऊंगा।" जीमूतवाहन लाल वस्त्र ओढ़कर वधशिला पर लेट गए। गरुड़ जी आए और उन्हें अपने पंजों में दबाकर पर्वत शिखर पर ले गए। जब गरुड़ ने देखा कि यह प्राणी पीड़ा से कराहने के स्थान पर शांत और प्रसन्न है, तो उन्होंने रुककर परिचय पूछा। जीमूतवाहन ने सत्य कह सुनाया। गरुड़ जी उनके इस अप्रतिम त्याग और परोपकार से अत्यंत प्रभावित हुए। उन्होंने जीमूतवाहन को जीवनदान दिया और वरदान दिया कि वे भविष्य में कभी किसी नाग का शिकार नहीं करेंगे तथा जो माताएं जीमूतवाहन की पूजा करेंगी, उनकी संतान सदा दीर्घायु और संकटमुक्त रहेगी।

चील और सियारिन की पावन कथा: एक वन में नर्मदा नदी के तट पर एक चील और एक सियारिन सहेलियां थीं। दोनों ने वनवासियों को जीवित्पुत्रिका का व्रत करते देखकर स्वयं भी निर्जला व्रत रखने का संकल्प लिया। किन्तु रात्रि में भूख से व्याकुल सियारिन ने चुपके से एक मृत पशु का मांस खाकर अपना व्रत भंग कर लिया, जबकि चील ने पूरी रात भूखी-प्यासी रहकर निष्ठापूर्वक व्रत पूर्ण किया। अगले जन्म में दोनों ने मनुष्य रूप में दो बहनों के रूप में जन्म लिया। व्रत के प्रभाव से चील के सातों पुत्र बलवान, सुंदर और दीर्घायु हुए, जबकि व्रत भंग करने के कारण सियारिन के सभी बच्चे जन्म लेते ही मृत्यु को प्राप्त हो गए। सियारिन ने जब पश्चाताप कर जिउतिया व्रत किया, तब उसके जीवन में भी संतान सुख लौटा।

🪔 व्रत पूजा विधि एवं नियम

✨ व्रत उद्यापन विधि

व्रत के उपरांत ब्राह्मण को अन्न, वस्त्र और फल दान दिया जाता है तथा संतान को अभिमंत्रित जिउतिया का लाल धागा गले में पहनाया जाता है।

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