श्री यमुनोत्री धाम
गढ़वाल हिमालय में समुद्र तल से 3,293 मीटर की ऊंचाई पर, बंदरपूंछ पर्वत की गोद में स्थित श्री यमुनोत्री धाम उत्तराखंड के पवित्र 'छोटा चार धाम' यात्रा का प्रथम पड़ाव है। यहीं से सूर्यपुत्री मां यमुना का पावन अवतरण होता है।
गढ़वाल हिमालय में समुद्र तल से 3,293 मीटर की ऊंचाई पर, बंदरपूंछ पर्वत की गोद में स्थित श्री यमुनोत्री धाम उत्तराखंड के पवित्र 'छोटा चार धाम' यात्रा का प्रथम पड़ाव है। यहीं से सूर्यपुत्री मां यमुना का पावन अवतरण होता है।
यमुनोत्री मंदिर का निर्माण सर्वप्रथम 19वीं शताब्दी में टिहरी गढ़वाल के महाराजा सुदर्शन शाह ने कराया था। भूकंप से क्षतिग्रस्त होने के उपरांत जयपुर की महारानी गुलेरिया ने 19वीं सदी के उत्तरार्ध में इसका पुनर्निर्माण कराया। मंदिर कत्युरी शैली में विशाल प्रस्तर खंडों और देवदार की लकड़ी से निर्मित है।
मंदिर के गर्भगृह में मां यमुना की काले संगमरमर की अत्यंत शांत और सौम्य प्रतिमा प्रतिष्ठापित है। मंदिर के ठीक समीप 'सूर्य कुंड' नामक अत्यंत गर्म खौलता हुआ प्राकृतिक जल स्रोत है, जिसमें 90°C तक गर्म जल उबलता रहता है। श्रद्धालु कपड़े की पोटली में चावल और आलू इस कुंड में डालकर पकाते हैं, जो दिव्य प्रसाद के रूप में ग्रहण किया जाता है।
पौराणिक मान्यता के अनुसार, मां यमुना सूर्यदेव और माता संज्ञा की पुत्री तथा यमराज (मृत्यु के देवता) और शनिदेव की सगी बहन हैं। यमुना जी अत्यंत चंचल और पावन हैं। मान्यता है कि प्राचीन काल में महर्षि असित यहां अपनी कुटिया बनाकर रहते थे और नित्य गंगा और यमुना दोनों में स्नान करते थे। वृद्धावस्था में जब वे यमुनोत्री जाने में असमर्थ हो गए, तो मां यमुना ने स्वयं उनकी कुटिया के समक्ष एक धारा के रूप में प्रकट होकर उन्हें दर्शन दिए।
यम द्वितीया (भाई दूज) के दिन यमराज ने अपनी बहन यमुना को वरदान दिया था कि जो कोई भी प्राणी आज के दिन यमुना के जल में स्नान करेगा, उसे अकाल मृत्यु और यमलोक की यातनाएं नहीं भोगनी पड़ेंगी।
उत्तराखंड चार धाम यात्रा का शास्त्र सम्मत क्रम यमुनोत्री से ही आरंभ होता है। यमुनोत्री में सूर्य कुंड के पवित्र जल का स्पर्श और मां यमुना के दर्शन से व्यक्ति का अंतःकरण निष्पाप होकर दैहिक तापों से मुक्त हो जाता है।
मंदिर के समीप स्थित उबलता हुआ प्राकृतिक गर्म जल कुंड, जहां चावल की पोटली डालकर पकाई जाती है और प्रसाद रूप में ली जाती है।
सूर्य कुंड के पास स्थित एक पावन शिला, जिसका पूजन यमुनोत्री मंदिर में प्रवेश करने से पूर्व अनिवार्य माना जाता है।
यमुनोत्री से 12 किमी ऊपर अत्यंत दुर्गम ग्लेशियर झील, जो यमुना नदी का वास्तविक उद्गम स्थल है।
यमुनोत्री की पैदल यात्रा का मुख्य बेस कैंप (6 किमी की चढ़ाई यहीं से आरंभ होती है) जहां प्राकृतिक गर्म पानी के कुंड हैं।
जानकी चट्टी से 6 किमी की चढ़ाई कर यमुनोत्री पहुंचें। सर्वप्रथम दिव्य शिला का पूजन करें, तदुपरांत सूर्य कुंड में स्नान या जल का स्पर्श करें। गर्भगृह में मां यमुना की प्रतिमा के दर्शन करें और सूर्य कुंड में पके चावल का प्रसाद ग्रहण करें।
| आरती / पूजा अनुष्ठान | निर्धारित समय |
|---|---|
| मंगला आरती | प्रातः 06:00 - 06:30 |
| दिन भर सामान्य दर्शन | प्रातः 07:00 - संध्या 06:00 |
| सांध्य महाआरती | संध्या 06:30 - 07:30 |
| शयन आरती व कपाट बंदी | रात्रि 08:00 |
निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट (देहरादून) लगभग 210 किमी दूर है। खरसाली (जानकी चट्टी के पास) हेलीपैड तक हेलीकॉप्टर सेवा उपलब्ध है।
निकटतम रेलवे स्टेशन देहरादून (लगभग 175 किमी) और ऋषिकेश (लगभग 200 किमी) हैं।
देहरादून या ऋषिकेश से बड़कोट होते हुए जानकी चट्टी (सड़क का अंतिम छोर) तक पहुंचा जाता है। जानकी चट्टी से 6 किमी पैदल/घोड़े/पालकी से चढ़ाई है।
मई-जून और सितंबर-अक्टूबर का समय सबसे उत्तम है। शीतकाल में कपाट बंद रहते हैं और माता खरसाली गांव में पूजी जाती हैं।
जानकी चट्टी, खरसाली और बड़कोट में जीएमवीएन (GMVN) टूरिस्ट लॉज, निजी होटल और धर्मशालाएं उपलब्ध हैं।
इस पावन तीर्थ के अधिष्ठाता देव की आराधना एवं नित्य पाठ हेतु प्रमुख स्तोत्र, मंत्र एवं आरतियां:
सनातन परंपरा में पश्चिम से पूर्व की ओर परिक्रमा का नियम है। यमुनोत्री उत्तराखंड के चार धामों में सबसे पश्चिम में स्थित है, अतः यात्रा का शुभारंभ यमुनोत्री से फिर गंगोत्री, केदारनाथ और अंत में बद्रीनाथ का विधान है।
सूर्य कुंड का प्राकृतिक तापमान 90°C तक रहता है। श्रद्धालु कपड़े की पोटली में कच्चे चावल बांधकर उबलते जल में डालते हैं, जो मात्र 5 मिनट में पूरी तरह पक जाते हैं।
जानकी चट्टी से यमुनोत्री की चढ़ाई लगभग 6 किलोमीटर की है, जिसे पैदल चढ़ने में 3 से 4 घंटे लगते हैं। खच्चर, डंडी और कंडी की भी सुविधा उपलब्ध है।
भाई दूज पर कपाट बंद होने के उपरांत मां यमुना की उत्सव डोली जानकी चट्टी के समीप स्थित उनके मायके 'खरसाली गांव' लाई जाती है, जहां 6 माह पूजा होती है।
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