श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग
अरब सागर की गर्जना करती उत्ताल तरंगों के तट पर स्थित श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग है। अनेक विध्वंसों के उपरांत भी यह मंदिर सनातन संस्कृति के अमर पुनरुत्थान का शाश्वत प्रतीक है।
अरब सागर की गर्जना करती उत्ताल तरंगों के तट पर स्थित श्री सोमनाथ ज्योतिर्लिंग द्वादश ज्योतिर्लिंगों में सर्वप्रथम ज्योतिर्लिंग है। अनेक विध्वंसों के उपरांत भी यह मंदिर सनातन संस्कृति के अमर पुनरुत्थान का शाश्वत प्रतीक है।
सोमनाथ मंदिर का इतिहास सनातन आस्था की अदम्य जिजीविषा का ज्वलंत प्रमाण है। ऋग्वेद में इसका उल्लेख 'प्रभास क्षेत्र' के रूप में मिलता है। परंपरा के अनुसार, सोमनाथ का प्रथम मंदिर चंद्रदेव ने स्वर्ण से, द्वितीय रावण ने रजत से, तृतीय श्री कृष्ण ने काष्ठ से और चतुर्थ राजा भीमदेव सोलंकी ने पाषाण से बनवाया था। 11वीं से 18वीं शताब्दी के मध्य महमूद गजनवी, अलाउद्दीन खिलजी और औरंगजेब द्वारा इस मंदिर पर अनेक बर्बर आक्रमण किए गए, किंतु हर बार आस्था के स्तंभ ने राख से पुनः जन्म लिया।
भारत की स्वतंत्रता के उपरांत 13 नवंबर 1947 को लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल ने समुद्र के जल को हाथ में लेकर सोमनाथ के भव्य पुनर्निर्माण का ऐतिहासिक संकल्प लिया। 11 मई 1951 को भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद के कर-कमलों द्वारा वर्तमान भव्य 'कैलाश महामेरु प्रासाद' शैली के मंदिर में ज्योतिर्लिंग की प्राण-प्रतिष्ठा की गई। मंदिर का मुख्य शिखर 155 फीट ऊंचा है और इसके शिखर पर 10 टन वजनी कलश सुशोभित है। मंदिर परिसर में स्थापित ऐतिहासिक 'बाणस्तंभ' यह प्रमाणित करता है कि सोमनाथ से दक्षिणी ध्रुव (Antarctica) तक समुद्र मार्ग में कोई भू-भाग नहीं है।
शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के अनुसार, प्रजापति दक्ष ने अपनी 27 नक्षत्र कन्याओं का विवाह चंद्रदेव (सोम) के साथ किया था। किंतु चंद्रदेव केवल रोहिणी से अत्यधिक प्रेम करते थे और अन्य पत्नियों की उपेक्षा करते थे। दुखी कन्याओं की पुकार पर क्रुद्ध होकर प्रजापति दक्ष ने चंद्रदेव को क्षय रोग (तपेदिक) से ग्रस्त होने और निष्प्रभ हो जाने का भयंकर शाप दे दिया।
शाप के प्रभाव से चंद्रदेव का तेज क्षीण होने लगा और सृष्टि में अंधकार छा गया। तब ब्रह्मा जी के परामर्श पर चंद्रदेव ने प्रभास क्षेत्र में आकर सरस्वती और समुद्र के संगम पर पार्थिव शिवलिंग बनाकर भगवान आशुतोष की 6 माह तक घोर तपस्या की। चंद्रदेव की अनन्य भक्ति से प्रसन्न होकर देवाधिदेव महादेव साक्षात प्रकट हुए और वरदान दिया—'हे सोम! तुम कृष्ण पक्ष में क्षीण होओगे किंतु शुक्ल पक्ष में पुनः प्रतिदिन बढ़ते हुए पूर्णिमा को पूर्ण प्रकाशित होओगे।' चंद्रमा के उद्धार के कारण भगवान शिव यहां 'सोमनाथ' के नाम से प्रथम ज्योतिर्लिंग के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
द्वादश ज्योतिर्लिंग स्तोत्र में सर्वप्रथम सोमनाथ की वंदना की गई है—'सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम्।' सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन एवं त्रिवेणी संगम में स्नान करने से असाध्य रोगों, चंद्र दोष और मानसिक विकारों से मुक्ति मिलती है और मनुष्य शिवलोक का अधिकारी बनता है।
मंदिर समुद्र तट पर स्थित प्राचीन स्तंभ जिस पर उत्कीर्ण है कि यहां से दक्षिण ध्रुव तक समुद्र में एक भी बाधा (भूमि) नहीं है।
हिरण, कपिला और सरस्वती नदियों का अरब सागर में पावन संगम, जहां स्नान और पितृ तर्पण का अनंत गुना फल मिलता है।
सोमनाथ से 4 किमी दूर स्थित वह पावन स्थल जहां जरा नामक बहेलिए का बाण लगने के बाद भगवान श्री कृष्ण ने अपनी पार्थिव लीला संवरण की थी।
हिरण नदी के तट पर स्थित वह पावन स्थल जहां से भगवान श्री कृष्ण वैकुंठ धाम पधारे थे।
प्रतिदिन संध्या को मंदिर प्रांगण में अमिताभ बच्चन की गूंजती आवाज में सोमनाथ के अमर इतिहास का भव्य प्रदर्शन।
मंदिर में प्रवेश से पूर्व सुरक्षा जांच होती है (कैमरा, मोबाइल पूर्णतः लॉकर में जमा करने होते हैं)। मंदिर के मुख्य गर्भगृह में स्थित दिव्य सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के दर्शन कर ओंकार मंत्र का जप करें। मंदिर ट्रस्ट द्वारा विशेष पूजा, बिल्वपत्र अर्पण और महामृत्युंजय जप की ऑनलाइन व्यवस्था उपलब्ध है।
| आरती / पूजा अनुष्ठान | निर्धारित समय |
|---|---|
| प्रातः महाआरती | प्रातः 07:00 - 07:30 |
| मध्याह्न भोग आरती | दोपहर 12:00 - 12:30 |
| संध्या दिव्य आरती | संध्या 07:00 - 07:30 |
| ध्वनि एवं प्रकाश शो | रात्रि 08:00 - 09:00 |
निकटतम हवाई अड्डा दीव (लगभग 85 किमी) और राजकोट (लगभग 200 किमी) है। पोरबंदर हवाई अड्डा लगभग 130 किमी दूर है।
वेरावल जंक्शन (VRL) मंदिर से मात्र 5 किमी दूर है, जो अहमदाबाद, मुंबई, पुणे और जबलपुर से सीधी रेल सेवा से जुड़ा है।
अहमदाबाद (लगभग 410 किमी), राजकोट (लगभग 195 किमी) से गुजरात राज्य परिवहन और निजी लग्जरी बसें उपलब्ध हैं।
अक्टूबर से मार्च तक का मौसम अत्यंत सुहावना रहता है। महाशिवरात्रि और श्रावण मास में दर्शन का विशेष महत्व है।
श्री सोमनाथ ट्रस्ट के सागर दर्शन, लीलावती अतिथि भवन, माहेश्वरी अतिथि भवन और अनेक निजी होटल उपलब्ध हैं।
इस पावन तीर्थ के अधिष्ठाता देव की आराधना एवं नित्य पाठ हेतु प्रमुख स्तोत्र, मंत्र एवं आरतियां:
बाणस्तंभ पर लिखा है 'आसमुद्रांत दक्षिण ध्रुव पर्यंत अबाधित ज्योतिर्मार्ग'। इसका अर्थ है कि सोमनाथ से सीधे 9,950 किमी दूर दक्षिण ध्रुव तक सीधी रेखा में एक भी द्वीप या भू-भाग नहीं आता। प्राचीन भारत के भूगोलविदों का यह ज्ञान चमत्कारी है।
स्वतंत्र भारत में सरदार वल्लभभाई पटेल के संकल्प, के.एम. मुंशी के मार्गदर्शन और भारत के प्रथम राष्ट्रपति डॉ. राजेंद्र प्रसाद की उपस्थिति में मंदिर का नव-निर्माण पूर्ण हुआ।
हाँ, मंदिर समुद्र तट पर होने के कारण आरती के समय अरब सागर की ऊंची लहरें मंदिर की विशाल प्राचीर से टकराकर गर्जना करती हैं, जो दृश्य अत्यंत अलौकिक लगता है।
भालका तीर्थ सोमनाथ मंदिर से लगभग 4 किमी दूर वेरावल मार्ग पर स्थित है, जहां भगवान श्री कृष्ण के चरण कमल में तीर लगा था।
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