श्री रामेश्वरम धाम
हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के पावन संगम पर स्थित रामेश्वरम द्वीप चार धामों में दक्षिण का महातीर्थ तथा द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एकादश ज्योतिर्लिंग है, जहां प्रभु श्री राम ने लंका विजय से पूर्व महादेव की बालू से स्थापना की थी।
हिंद महासागर और बंगाल की खाड़ी के पावन संगम पर स्थित रामेश्वरम द्वीप चार धामों में दक्षिण का महातीर्थ तथा द्वादश ज्योतिर्लिंगों में एकादश ज्योतिर्लिंग है, जहां प्रभु श्री राम ने लंका विजय से पूर्व महादेव की बालू से स्थापना की थी।
श्री रामनाथस्वामी मंदिर का वर्तमान भव्य स्वरूप 12वीं शताब्दी में पांड्य राजाओं तथा 17वीं शताब्दी में रामनाड के सेतुपति राजाओं द्वारा निर्मित कराया गया। यह मंदिर दक्षिण भारतीय द्रविड़ स्थापत्य कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण है। मंदिर का बाहरी परकोटा और गलियारा (कॉरिडोर) विश्व का सबसे लंबा मंदिर गलियारा है, जिसकी कुल लंबाई लगभग 3,850 फीट है।
इस गलियारे में 1,212 विशाल नक्काशीदार प्रस्तर स्तंभ हैं, जिनमें से प्रत्येक स्तंभ पर अत्यंत सूक्ष्म एवं सजीव मूर्तियां उत्कीर्ण हैं। इन स्तंभों की समरूपता इतनी सटीक है कि एक सिरे से देखने पर सभी खंभे एक ही सीध में दिखाई देते हैं। मंदिर के पूर्वी और पश्चिमी गोपुरम अत्यंत विशाल और गगनचुंबी हैं, जिन पर हिंदू पौराणिक आख्यानों की सुंदर कलाकृतियां बनी हैं। मंदिर परिसर के भीतर 22 पावन तीर्थ कुंड स्थित हैं, जिनका जल अलग-अलग औषधीय व आध्यात्मिक गुणों से परिपूर्ण है।
वाल्मीकि रामायण एवं शिव पुराण की कोटिरुद्र संहिता के अनुसार, जब भगवान श्री राम माता सीता की खोज में वानर सेना सहित दक्षिण समुद्र तट पर पहुंचे, तो उन्होंने रावण वध और लंका विजय हेतु देवाधिदेव महादेव की कृपा प्राप्त करने का संकल्प लिया। प्रभु राम ने अपने परमभक्त श्री हनुमान जी को कैलाश पर्वत से शिवलिंग लाने का आदेश दिया।
शुभ मुहूर्त निकट आ रहा था किंतु हनुमान जी के लौटने में विलंब हो गया। तब माता जानकी ने समुद्र तट की पावन बालू (रेत) से अपने कर-कमलों द्वारा एक दिव्य शिवलिंग का निर्माण किया। भगवान श्री राम ने वैदिक ऋचाओं के साथ उस बालू के शिवलिंग की प्राण प्रतिष्ठा की, जो 'रामलिंगम' कहलाया। जब हनुमान जी कैलाश से शिवलिंग लेकर लौटे और दूसरा लिंग देखकर दुखी हुए, तो प्रभु राम ने उन्हें शांत करते हुए कहा कि वे उस लिंग को भी स्थापित करें। प्रभु राम ने वरदान दिया कि रामलिंगम के दर्शन से पहले भक्त हनुमान जी द्वारा लाए गए 'विश्वलिंगम' का दर्शन व पूजन करेंगे। यह मर्यादा आज भी निभाई जाती है।
रामेश्वरम के दर्शन और अग्नि तीर्थम में स्नान करने से ब्रह्महत्या, गोहत्या जैसे महापापों से मुक्ति मिलती है और काशी यात्रा का पुण्य पूर्ण माना जाता है। सनातन परंपरा में काशी से गंगाजल लाकर रामेश्वरम में महादेव का जलाभिषेक करने और रामेश्वरम से बालू ले जाकर त्रिवेणी संगम में विसर्जित करने की परम पुण्यदायी परंपरा है।
मंदिर के ठीक सामने स्थित शांत समुद्र तट, जहां माता सीता ने अपनी पवित्रता की अग्नि परीक्षा दी थी। यहां स्नान करने से समस्त पाप धुल जाते हैं।
कोटि तीर्थ, चक्र तीर्थ, अमृत वापी आदि 22 कुएं, जिनके जल से क्रमबद्ध स्नान करने पर शरीर और आत्मा पवित्र हो जाती है।
रामेश्वरम से 18 किमी दूर वह स्थल जहां प्रभु श्री राम ने धनुष के अग्रभाग से सेतु का निर्माण आरंभ किया था।
द्वीप का सबसे ऊंचा टीला जहां भगवान श्री राम के चरण पादुका मंदिर स्थापित हैं, जहां से संपूर्ण द्वीप दिखाई देता है।
वह ऐतिहासिक पवित्र स्थान जहां विभीषण ने प्रभु श्री राम की शरण ली थी और प्रभु ने उनका राज्याभिषेक किया था।
सर्वप्रथम अग्नि तीर्थम समुद्र में पवित्र डुबकी लगाएं। इसके बाद मंदिर परिसर में प्रवेश कर 22 पावन कुंडों के जल से स्नान करें (मंदिर के सेवादार बाल्टियों से स्नान कराते हैं)। सूखे पवित्र वस्त्र धारण कर सर्वप्रथम हनुमान जी द्वारा लाए गए श्री विश्वलिंगम का दर्शन करें, तदुपरांत भगवान रामनाथस्वामी (रामलिंगम) और माता पर्वतवर्धिनी के दर्शन करें।
| आरती / पूजा अनुष्ठान | निर्धारित समय |
|---|---|
| स्पटिक लिंग दर्शन व पल्लीअराई | प्रातः 05:00 - 06:00 |
| कालसंधि पूजा व मंगल आरती | प्रातः 07:00 - 08:00 |
| उच्छिकालम पूजा (मध्याह्न भोग) | दोपहर 12:00 - 01:00 |
| सायं संध्या आरती | संध्या 06:00 - 07:00 |
| अर्थजाम पूजा व शयन आरती | रात्रि 08:30 - 09:00 |
निकटतम हवाई अड्डा मदुरै अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (लगभग 175 किमी) है। मदुरै से रामेश्वरम हेतु नियमित टैक्सी व बस सेवाएं उपलब्ध हैं।
रामेश्वरम रेलवे स्टेशन (RMM) ऐतिहासिक पंबन समुद्री पुल द्वारा मुख्य भूमि से जुड़ा है। भारत के सभी प्रमुख शहरों से ट्रेनें उपलब्ध हैं।
मदुरै, तिरुचिरापल्ली, कन्याकुमारी और चेन्नई से उत्कृष्ट राष्ट्रीय राजमार्ग NH-49 द्वारा पंबन रोड ब्रिज होते हुए रामेश्वरम पहुंचा जा सकता है।
अक्टूबर से अप्रैल का समय सबसे सुहावना होता है। महाशिवरात्रि (फरवरी-मार्च) पर विशेष मेला लगता है।
रामनाथस्वामी मंदिर ट्रस्ट की धर्मशालाएं, गुजराती समाज भवन, मारवाड़ी धर्मशाला और विभिन्न श्रेणियों के होटल रामेश्वरम में उपलब्ध हैं।
इस पावन तीर्थ के अधिष्ठाता देव की आराधना एवं नित्य पाठ हेतु प्रमुख स्तोत्र, मंत्र एवं आरतियां:
मान्यता है कि भगवान राम ने अपने तरकश के बाणों से इन 22 कुंडों का निर्माण किया था। प्रत्येक कुंड का स्वाद और खनिज तत्व भिन्न है, जिनमें स्नान करने से दैहिक, दैविक और भौतिक तापों का नाश होता है।
मंदिर में आदि शंकराचार्य जी द्वारा स्थापित श्वेत स्फटिक मणि शिवलिंग है, जिसका विशेष अभिषेक और दर्शन प्रतिदिन प्रातः 5:00 से 6:00 बजे तक ही होता है।
हाँ, अब रामेश्वरम से धनुषकोडी के अंतिम छोर अरिचल मुनाई (राम सेतु का आरंभ बिंदु) तक पक्की सड़क बन चुकी है, जहां टैक्सी व बस से आसानी से जाया जा सकता है।
सनातन धर्म के अनुसार काशी से गंगाजल लाकर रामेश्वरम में भगवान शिव पर चढ़ाना और रामेश्वरम की बालू ले जाकर प्रयागराज संगम में प्रवाहित करने से ही संपूर्ण तीर्थ यात्रा फलित होती है।
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