श्री जगन्नाथ पुरी धाम
पूर्वी भारत में महोदधि (समुद्र) के तट पर स्थित श्री जगन्नाथ पुरी धाम चार महाधामों में से एक है, जहां भगवान श्री कृष्ण अपने भ्राता बलभद्र और भगिनी सुभद्रा के साथ दारुब्रह्म (काष्ठ विग्रह) रूप में साक्षात विराजमान हैं।
पूर्वी भारत में महोदधि (समुद्र) के तट पर स्थित श्री जगन्नाथ पुरी धाम चार महाधामों में से एक है, जहां भगवान श्री कृष्ण अपने भ्राता बलभद्र और भगिनी सुभद्रा के साथ दारुब्रह्म (काष्ठ विग्रह) रूप में साक्षात विराजमान हैं।
श्री जगन्नाथ मंदिर का वर्तमान भव्य स्वरूप 12वीं शताब्दी में पूर्वी गंग वंश के प्रतापी सम्राट अनंतवर्मन चोडगंग देव द्वारा आरंभ कराया गया था और उनके पौत्र अनंगभीम देव द्वारा पूर्ण किया गया। यह मंदिर कलिंग वास्तुकला का अनुपम शिखर है, जो 4 लाख वर्ग फुट से अधिक के विशाल क्षेत्र में मेघनाद पाचेरी नामक दोहरी प्राचीर से सुरक्षित है।
मंदिर का मुख्य शिखर (विमान) 214 फीट ऊंचा है, जिसके शीर्ष पर नीलचक्र (अष्टधातु निर्मित) और पतितपावन ध्वज सुशोभित है। यह ध्वज सदैव वायु की विपरीत दिशा में फहराता है, जो आज भी विज्ञान के लिए एक अनसुलझा रहस्य है। मंदिर में चार मुख्य मंडप हैं—गर्भगृह (विमान), जगमोहन (मुखशाला), नटमंडप (नृत्य सभा) और भोगमंडप। मंदिर के सिंहद्वार से प्रवेश करते ही बाईस पावन सीढ़ियां (बाईसी पहाच) आती हैं, जिन पर पैर रखते ही समस्त पापों का क्षय माना जाता है।
स्कंद पुराण के उत्कल खंड के अनुसार, मालवा नरेश महाराजा इंद्रद्युम्न परम विष्णुभक्त थे। उन्हें स्वप्न में भगवान नीलमाधव के दर्शन हुए। उन्होंने अपने पुरोहित के भाई विद्यापति को नीलमाधव की खोज में भेजा। विद्यापति ने सबर राजा विश्ववसु की सहायता से गुप्त रूप से नीलमाधव के दर्शन किए, किंतु जैसे ही राजा इंद्रद्युम्न पहुंचे, नीलमाधव अंतर्ध्यान हो गए।
राजा के विलाप पर आकाशवाणी हुई कि समुद्र में बहती हुई एक दिव्य दारु (नीम की लकड़ी) आएगी, जिससे प्रतिमा का निर्माण होगा। तब स्वयं देवशिल्पी विश्वकर्मा एक वृद्ध बढ़ई के वेश में आए और शर्त रखी कि 21 दिनों तक उन्हें बंद कमरे में मूर्ति निर्माण करने दिया जाए। किंतु 14 दिनों बाद जब कोई ध्वनि नहीं आई, तो महारानी गुंडिचा के आग्रह पर राजा ने द्वार खोल दिया। विश्वकर्मा अंतर्ध्यान हो गए और विग्रहों के हाथ-पैर अधूरे रह गए। तब भगवान ने आकाशवाणी की कि वे इसी निराकार-साकार दारुब्रह्म रूप में कलियुग के जीवों का उद्धार करेंगे।
पुरी धाम में भगवान का महाप्रसाद कभी जूठा नहीं होता और इसे ग्रहण करने मात्र से करोड़ों जन्मों के संचित पाप भस्म हो जाते हैं। यहां भगवान का धड़कता हुआ 'ब्रह्म पदार्थ' (भगवान श्री कृष्ण का हृदय) विग्रह में सुरक्षित रहता है, जिसे नवकलेवर के समय अत्यंत गोपनीय विधि से नए काष्ठ विग्रह में स्थानांतरित किया जाता है।
विश्व की सबसे बड़ी मंदिर रसोई, जहां 7 मिट्टी की हांडियों को एक के ऊपर एक रखकर केवल काष्ठ अग्नि से शुद्ध महाप्रसाद बनता है।
मंदिर प्रांगण में स्थित 51 शक्तिपीठों में से एक, जहां माता सती की नाभि गिरी थी। जगन्नाथ जी का नैवेद्य विमला देवी को अर्पित होने के बाद ही महाप्रसाद बनता है।
भगवान जगन्नाथ की मौसी का घर, जहां आषाढ़ शुक्ल द्वितीया की रथयात्रा के दौरान भगवान 7 दिनों तक विश्राम करते हैं।
विशाल पावन सरोवर जहां भगवान की चंदन यात्रा और नौका विहार उत्सव अत्यंत धूमधाम से मनाया जाता है।
पुरी का वह पावन समुद्र तट जहां स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति मानी जाती है।
सिंहद्वार से प्रवेश कर बाईस सीढ़ियों (बाईसी पहाच) का वंदन करें। गर्भगृह में रत्नवेदी पर विराजमान भगवान जगन्नाथ, बलभद्र और देवी सुभद्रा के पावन दर्शन करें। इसके उपरांत विमला देवी, महालक्ष्मी मंदिर और कल्पवृक्ष की परिक्रमा करें। आनंद बाजार से श्री जगन्नाथ महाप्रसाद ग्रहण करना अनिवार्य माना गया है।
| आरती / पूजा अनुष्ठान | निर्धारित समय |
|---|---|
| द्वारफिटा व मंगला आरती | प्रातः 05:00 - 05:30 |
| गोपाल वल्लभ भोग | प्रातः 09:00 - 09:30 |
| मध्याह्न धूप (राजभोग) | दोपहर 12:30 - 01:30 |
| संध्या आरती व धूप | संध्या 06:30 - 07:30 |
| बड़शृंगार आरती व शयन | रात्रि 10:30 - 11:30 |
निकटतम हवाई अड्डा बीजू पटनायक अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (भुवनेश्वर) लगभग 60 किमी दूर है।
पुरी रेलवे स्टेशन (PURI) देश के सभी प्रमुख शहरों दिल्ली, कोलकाता, चेन्नई, मुंबई से सीधी सुपरफास्ट ट्रेनों से जुड़ा है।
भुवनेश्वर से 4-लेन राष्ट्रीय राजमार्ग NH-316 द्वारा मात्र 1.5 घंटे में पुरी पहुंचा जा सकता है।
अक्टूबर से मार्च का मौसम सुखद होता है। आषाढ़ मास (जून-जुलाई) में विश्वप्रसिद्ध रथयात्रा का भव्य दर्शन होता है।
पुरी में जगन्नाथ मंदिर ट्रस्ट के भक्त निवास, अनगिनत ओडिशा पर्यटन होटल, समुद्र तट के रिसॉर्ट्स और धर्मशालाएं उपलब्ध हैं।
इस पावन तीर्थ के अधिष्ठाता देव की आराधना एवं नित्य पाठ हेतु प्रमुख स्तोत्र, मंत्र एवं आरतियां:
यह पुरी मंदिर का एक चमत्कारी रहस्य है कि मुख्य शिखर का पतितपावन ध्वज वायु के रुख के विपरीत दिशा में लहराता है, जिसका कोई वैज्ञानिक कारण आज तक सिद्ध नहीं हो सका।
जब आषाढ़ मास में अधिकमास (मलमास) आता है, तब 8, 12 या 19 वर्षों में विशेष नीम के पेड़ों की लकड़ी से भगवान की नई प्रतिमाएं बनाई जाती हैं, जिसे नवकलेवर कहते हैं।
पारंपरिक नियमों के अनुसार मुख्य मंदिर में केवल सनातन धर्मियों का प्रवेश मान्य है। अन्य सभी श्रद्धालु सिंहद्वार पर स्थापित पतितपावन विग्रह के दर्शन करते हैं।
मिट्टी की 7 हांडियों को चूल्हे पर एक के ऊपर एक रखा जाता है, और सबसे ऊपर की हांडी का भोजन सबसे पहले पकता है। यह महाप्रसाद कभी कम नहीं पड़ता।
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