श्री हरिद्वार / मायापुरी धाम - Shri Haridwar (Mayapuri Dham)
🏛️ तृतीय मोक्षपुरी / गंगाद्वार

श्री हरिद्वार / मायापुरी धाम

Shri Haridwar (Mayapuri Dham) • 📍 हरिद्वार, उत्तराखंड, भारत

सप्त मोक्ष पुरियों में तृतीय, 'मायापुरी' नाम से विख्यात हरिद्वार वह पावन नगरी है जहां हिमालय को चीरकर पतितपावनी मां गंगा मैदानी भाग में प्रथम प्रवेश करती हैं। यह चार धाम यात्रा का प्रवेश द्वार तथा कुंभ महाकुंभ का अमृत स्थल है।

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अधिष्ठाता देव मां गंगा एवं भगवान शिव (हरिद्वार) / भगवान विष्णु (हरिद्वार)
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शक्ति / संगिनी माता पार्वती एवं लक्ष्मी
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पवित्र नदी / सरोवर पतितपावनी मां गंगा (मैदानी भाग में प्रथम प्रवेश) एवं हर की पौड़ी
ऐतिहासिक काल अनादि वैदिक काल (राजा विक्रमादित्य के भाई भर्तृहरि की तपस्थली)
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स्थापत्य शैली प्राचीन गंगा घाट एवं परंपरागत नागर-पहाड़ी मंदिर स्थापत्य
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प्रमुख पर्व व उत्सव कुंभ मेला एवं अर्धकुंभ, गंगा दशहरा, कांवड़ मेला, सोमवती अमावस्या
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🏛️ विस्तृत इतिहास एवं प्राचीन वास्तुकला (History & Architecture)

हरिद्वार का ऐतिहासिक उल्लेख महाभारत, रामायण और चीनी यात्री ह्वेनसांग के यात्रा वृत्तांतों में 'मो-यू-लो' (मायापुरी) के नाम से मिलता है। मान्यता है कि ईसा पूर्व प्रथम शताब्दी में उज्जैन के सम्राट विक्रमादित्य ने अपने बड़े भाई राजा भर्तृहरि की स्मृति में 'हर की पौड़ी' (भर्तृहरि की पैड़ी) का निर्माण कराया था, जिन्होंने यहां गंगा तट पर कठोर तपस्या की थी।

हर की पौड़ी पर स्थित 'ब्रह्मकुंड' वह मुख्य स्थल है, जहां समुद्र मंथन से निकले अमृत की बूंदें गिरी थीं। यहां गंगा की धवल धारा तीव्र वेग से प्रवाहित होती है। हर की पौड़ी के सामने घंटाघर और भव्य गंगा मंदिर स्थित है। संध्या समय जब सहस्रों श्रद्धालु पत्तों के दोनों में जलते हुए दीप गंगा में प्रवाहित करते हैं, तो संपूर्ण गंगा नदी तारों भरे आकाश के समान अलौकिक प्रतीत होती है।

📜 पावन पौराणिक कथाएं एवं दिव्य लीलाएं (Sacred Legends)

समुद्र मंथन के समय जब धन्वंतरि जी अमृत कलश लेकर प्रकट हुए, तो असुरों से अमृत की रक्षा हेतु देवराज इंद्र के पुत्र जयंत अमृत कलश लेकर भागे। असुरों और देवताओं के मध्य 12 दिनों तक युद्ध चला (जो मनुष्यों के 12 वर्षों के बराबर है)। इस दौरान पृथ्वी पर चार स्थानों पर अमृत की बूंदें छलकीं—हरिद्वार (ब्रह्मकुंड), प्रयागराज (संगम), उज्जैन (क्षिप्रा) और नासिक (गोदावरी)। इसी कारण इन चार स्थलों पर 12-12 वर्षों में 'महाकुंभ' का आयोजन होता है।

एक अन्य कथा के अनुसार, राजा सगर के 60,000 पुत्रों के उद्धार हेतु महाराज भगीरथ ने यहीं कठोर तपस्या की थी, जिससे प्रसन्न होकर मां गंगा स्वर्ग से भगवान शिव की जटाओं में और फिर शिव की जटाओं से हरिद्वार की इस पावन भूमि पर अवतरित हुईं। यहां भगवान शिव और भगवान विष्णु दोनों का वास है, इसलिए इसे 'हरिद्वार' (विष्णु का द्वार) और 'हरद्वार' (शिव का द्वार) दोनों कहा जाता है।

🌟 धार्मिक एवं आध्यात्मिक महात्म्य (Spiritual Significance)

हरिद्वार में गंगा स्नान से करोड़ों जन्मों के कायिक, वाचिक और मानसिक पाप धुल जाते हैं। स्कंद पुराण में कहा गया है कि मायापुरी में गंगाजल का आचमन करने से मनुष्य कभी नरक का मुख नहीं देखता और पितरों का तर्पण करने से उन्हें अक्षय तृप्ति प्राप्त होती है।

गङ्गे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् सन्निधिं कुरु॥
भावार्थ: हे मां गंगा, यमुना, गोदावरी, सरस्वती, नर्मदा, सिंधु और कावेरी! आप सभी पावन नदियां इस जल में अपनी सन्निधि (उपस्थिति) प्रदान कर इसे परम पवित्र बनाएं।

🛕 गर्भगृह, प्रमुख कुंड व दर्शनीय स्थल (Sacred Highlights)

✨ हर की पौड़ी व ब्रह्मकुंड (Har Ki Pauri)

हरिद्वार का सबसे पवित्र गंगा घाट जहां अमृत की बूंदें गिरी थीं और जहां प्रतिदिन सांध्य कालीन विश्वप्रसिद्ध गंगा आरती होती है।

✨ मां मनसा देवी मंदिर (Mansa Devi Temple)

बिल्व पर्वत की चोटी पर स्थित सिद्धपीठ जहां मनवांछित कामना पूर्ति हेतु श्रद्धालु धागा बांधते हैं। यहां रोप-वे की सुविधा है।

✨ मां चंडी देवी मंदिर (Chandi Devi Temple)

नील पर्वत पर स्थित आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित शक्तिपीठ, जहां देवी ने चंड-मुंड दैत्यों का संहार किया था।

✨ दक्ष प्रजापति मंदिर, कनखल (Daksha Mahadev)

सती के पिता राजा दक्ष की यज्ञ स्थली जहां माता सती ने योगाग्नि में आत्मदाह किया था और शिवजी ने वीरभद्र को प्रकट किया था।

✨ माया देवी मंदिर (Maya Devi Temple)

51 शक्तिपीठों में से एक जहां माता सती का नाभि और हृदय भाग गिरा था। इसी के नाम पर हरिद्वार को मायापुरी कहा गया।

⏰ दर्शन विधि, नियम एवं दैनिक आरती समय (Darshan & Timetable)

सर्वप्रथम हर की पौड़ी के ब्रह्मकुंड में गंगा स्नान करें। दोपहर में कनखल स्थित दक्षेश्वर महादेव मंदिर के दर्शन करें। इसके उपरांत रोप-वे या सीढ़ियों द्वारा मनसा देवी और चंडी देवी के दर्शन करें। संध्या को 5:30 बजे तक हर की पौड़ी पर स्थान ग्रहण कर विश्वप्रसिद्ध सांध्य आरती का साक्षात दर्शन करें।

आरती / पूजा अनुष्ठान निर्धारित समय
प्रातः कालीन प्रभात गंगा आरती प्रातः 05:30 - 06:15
दिन भर गंगा स्नान व दुग्धाभिषेक प्रातः 06:30 - संध्या 05:00
विश्वप्रसिद्ध सांध्य गंगा महाआरती संध्या 06:00 - 07:15 (ऋतु अनुसार)
दीपदान व मंत्रोच्चार संध्या आरती के उपरांत
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🚗 सम्पूर्ण यात्रा मार्गदर्शिका (How to Reach & Accommodation)

✈️ हवाई मार्ग (By Air)

निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट (देहरादून) लगभग 38 किमी दूर है, जो दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु आदि से सीधे जुड़ा है।

🚆 रेल मार्ग (By Train)

हरिद्वार जंक्शन (HW) उत्तर रेलवे का प्रमुख स्टेशन है, जहां शताब्दी, वंदे भारत सहित देश भर की ट्रेनें आती हैं।

🚗 सड़क मार्ग (By Road)

दिल्ली से मेरठ एक्सप्रेसवे और NH-334 द्वारा मात्र 3.5 घंटे में सड़क मार्ग से हरिद्वार पहुंचा जा सकता है।

🗓️ सर्वोत्तम यात्रा समय

अक्टूबर से अप्रैल का मौसम सबसे सुखद रहता है। वैशाख संक्रांति, गंगा दशहरा और सावन मास के कांवड़ मेले में अद्वितीय दृश्य होता है।

🏨 आवास एवं धर्मशालाएं

हरिद्वार में शांतिकुंज आश्रम, भारत सेवाश्रम संघ, गुजराती धर्मशाला, पंजाबी धर्मशाला और सैकड़ों आश्रम व होटल उपलब्ध हैं।

🌸 संबंधित पावन स्तोत्र, मंत्र व आरती (Related Prayers)

इस पावन तीर्थ के अधिष्ठाता देव की आराधना एवं नित्य पाठ हेतु प्रमुख स्तोत्र, मंत्र एवं आरतियां:

💡 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (Frequently Asked Questions)

❓ हर की पौड़ी पर गंगा आरती का सही समय क्या है?

गंगा आरती का समय सूर्यास्त के अनुसार बदलता है। गर्मियों में लगभग 6:30 से 7:00 बजे और सर्दियों में 5:30 से 6:00 बजे आरती आरंभ होती है। स्थान प्राप्त करने हेतु 1 घंटा पूर्व पहुंचना चाहिए।

❓ हरिद्वार को मायापुरी क्यों कहा जाता है?

सप्त मोक्ष पुरियों में हरिद्वार का प्राचीन पौराणिक नाम 'मायापुरी' है। यहां स्थित माता माया देवी का मंदिर 51 शक्तिपीठों में अत्यंत प्रतिष्ठित है।

❓ मनसा देवी और चंडी देवी कैसे पहुंचा जाता है?

दोनों मंदिरों तक पहुंचने हेतु 'उड़न खटोला' (रोप-वे) की आधुनिक केबल कार सुविधा उपलब्ध है, अथवा पैदल सीढ़ियों द्वारा भी जाया जा सकता है।

❓ कनखल का क्या धार्मिक महत्व है?

कनखल हरिद्वार का प्राचीन उपनगर है, जहां राजा दक्ष ने वह ऐतिहासिक यज्ञ कराया था जिसमें भगवान शिव का अपमान होने पर माता सती ने यज्ञ कुंड में देहत्याग किया था।

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