श्री द्वारकाधीश धाम
पश्चिमी समुद्र तट पर पावन गोमती नदी के संगम पर स्थित श्री द्वारकाधीश धाम (जगत मंदिर) चार धामों में पश्चिम का महातीर्थ तथा सप्त मोक्षदायिका पुरियों में प्रमुख है, जिसे स्वयं योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने अपनी राजधानी बनाया था।
पश्चिमी समुद्र तट पर पावन गोमती नदी के संगम पर स्थित श्री द्वारकाधीश धाम (जगत मंदिर) चार धामों में पश्चिम का महातीर्थ तथा सप्त मोक्षदायिका पुरियों में प्रमुख है, जिसे स्वयं योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण ने अपनी राजधानी बनाया था।
द्वारका का मूल मंदिर 2,500 वर्ष पूर्व भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ द्वारा हरि-गृह (भगवान के निजी कक्ष) के ऊपर बनवाया गया था। कालांतर में 16वीं शताब्दी में चालुक्य शैली में वर्तमान 7 मंजिला 'जगत मंदिर' का भव्य निर्माण हुआ। चूना पत्थर से निर्मित यह मंदिर 72 नक्काशीदार भव्य स्तंभों पर टिका हुआ है और इसका मुख्य शिखर 78 मीटर (लगभग 256 फीट) ऊंचा है।
मंदिर के शिखर पर 52 गज की विशाल ध्वजा फहराती है, जिस पर सूर्य और चंद्र के चिन्ह अंकित हैं। यह ध्वजा दिन में 5 बार वैदिक अनुष्ठान के साथ बदली जाती है। मंदिर में दो प्रमुख प्रवेश द्वार हैं—उत्तरी द्वार को 'मोक्ष द्वार' और दक्षिणी द्वार को 'स्वर्ग द्वार' कहा जाता है। स्वर्ग द्वार से गोमती नदी की 56 पावन सीढ़ियां उतरती हैं। मंदिर के गर्भगृह में भगवान द्वारकाधीश की श्याम वर्ण चतुर्भुज शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए अत्यंत तेजोमय प्रतिमा प्रतिष्ठित है।
श्रीमद्भागवत महापुराण एवं महाभारत के अनुसार, जब मगध नरेश जरासंध ने मथुरा पर 17 बार आक्रमण किया और कालयवन ने भी चढ़ाई की, तब भगवान श्री कृष्ण ने प्रजा की सुरक्षा और शांति हेतु मथुरा से पश्चिम समुद्र तट पर प्रस्थान किया। भगवान ने समुद्र देव से 12 योजन भूमि की याचना की और देवशिल्पी विश्वकर्मा द्वारा स्वर्ण-रत्न जड़ित अलौकिक 'द्वारका नगरी' का निर्माण करवाया।
कुरुक्षेत्र युद्ध के उपरांत गांधारी के शाप और ऋषियों के प्रभाव से जब यदुवंश का विनाश हुआ, तब भगवान श्री कृष्ण के परमधाम पधारने के पश्चात संपूर्ण स्वर्ण द्वारका समुद्र में समा गई। केवल भगवान का निजी निवास (हरि-गृह) शेष रहा। समुद्र के भीतर पुरातात्विक उत्खनन (Marine Archaeology) में जलमग्न द्वारका के विशाल प्रस्तर दुर्ग, स्तंभ और लंगर प्राप्त हुए हैं, जो महाभारत कालीन ऐतिहासिकता को प्रत्यक्ष प्रमाणित करते हैं।
सप्त मोक्ष पुरियों में द्वारका का स्थान अत्यंत विशिष्ट है—'अयोध्या मथुरा माया काशी काञ्ची अवन्तिका। पुरी द्वारावती चैव सप्तैता मोक्षदायिकाः॥' द्वारका में गोमती स्नान और द्वारकाधीश के दर्शन से मनुष्य को अंतकाल में वैकुंठ धाम की प्राप्ति होती है और वह पुनः गर्भवास के कष्टों में नहीं पड़ता।
गोमती नदी और अरब सागर का पवित्र मिलन स्थल, जहां चक्रतीर्थ पर स्नान करने से मोक्ष की प्राप्ति होती है।
समुद्र के भीतर स्थित द्वीप जहां भगवान श्री कृष्ण का निवास महल था और जहां सुदामा जी ने अपने सखा को चावल भेंट किए थे।
द्वारका से 2 किमी दूर एकांत में स्थित माता रुक्मिणी का भव्य मंदिर, जो दुर्वासा ऋषि के शाप की ऐतिहासिक कथा से जुड़ा है।
द्वारका से मात्र 17 किमी दूर स्थित द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक परम पावन शिव धाम।
वह पावन सरोवर जहां वृंदावन की गोपियों ने भगवान श्री कृष्ण के संग अंतिम महारास किया था और जहां की मिट्टी 'गोपी चंदन' कहलाती है।
सर्वप्रथम गोमती नदी के पवित्र संगम में स्नान करें। तदुपरांत स्वर्ग द्वार से 56 सीढ़ियां चढ़कर मंदिर परिसर में प्रवेश करें। भगवान द्वारकाधीश को तुलसी पत्र और माखन-मिश्री का भोग अर्पित करें। मंदिर के अंदर मोबाइल फोन व इलेक्ट्रॉनिक गैजेट्स पूर्णतः प्रतिबंधित हैं। जगत मंदिर के दर्शन के उपरांत रुक्मिणी मंदिर और बेट द्वारका की यात्रा अनिवार्य मानी जाती है।
| आरती / पूजा अनुष्ठान | निर्धारित समय |
|---|---|
| मंगला आरती | प्रातः 06:30 - 07:00 |
| शृंगार आरती व बालभोग | प्रातः 10:30 - 11:00 |
| राजभोग आरती व कपाट बंदी | दोपहर 12:00 - 01:00 |
| उत्थापन व संध्या आरती | संध्या 05:00 - 07:30 |
| शयन आरती व दर्शन | रात्रि 08:30 - 09:30 |
निकटतम हवाई अड्डे जामनगर (लगभग 135 किमी) और पोरबंदर (लगभग 100 किमी) हैं। राजकोट हवाई अड्डा लगभग 225 किमी दूर है।
द्वारका रेलवे स्टेशन (DWK) ब्राडगेज लाइन द्वारा अहमदाबाद, मुंबई, दिल्ली, जयपुर और कोलकाता से सीधे जुड़ा है।
अहमदाबाद (लगभग 440 किमी) और राजकोट से फोर-लेन राजमार्ग द्वारा गुजरात राज्य परिवहन (GSRTC) की एसी वोल्वो बसें उपलब्ध हैं।
अक्टूबर से मार्च का समय यात्रा हेतु अत्यंत सुखद रहता है। भाद्रपद कृष्ण अष्टमी पर कृष्ण जन्माष्टमी उत्सव देखने योग्य होता है।
द्वारका में तोरण टूरिस्ट बंगलो (गुजरात पर्यटन), बिड़ला धर्मशाला, रिलायंस धर्मशाला, स्वामी नारायण आश्रम और अनेक होटल उपलब्ध हैं।
इस पावन तीर्थ के अधिष्ठाता देव की आराधना एवं नित्य पाठ हेतु प्रमुख स्तोत्र, मंत्र एवं आरतियां:
मंदिर के शिखर पर फहराने वाली 52 गज की ध्वजा 52 यदुवंशी द्वारों और 12 राशियों व 27 नक्षत्रों सहित संपूर्ण ब्रह्मांड पर भगवान श्री कृष्ण के आधिपत्य का प्रतीक है। इसे दिन में 5 बार बदला जाता है।
द्वारका से 30 किमी दूर ओखा बंदरगाह तक सड़क मार्ग से जाया जाता है। वहां से नाव या नव-निर्मित भव्य 'सुदर्शन सेतु' (केबल ब्रिज) द्वारा बेट द्वारका पहुंचा जाता है।
पौराणिक कथा के अनुसार महर्षि दुर्वासा के रथ को खींचते समय माता रुक्मिणी को प्यास लगी और श्री कृष्ण ने गंगा प्रकट की। बिना दुर्वासा जी से पूछे जल पीने के कारण ऋषि ने उन्हें श्री कृष्ण से 12 वर्ष विलग रहने का शाप दिया था।
द्वारका के गोपी तालाब की पीली मिट्टी को गोपी चंदन कहा जाता है। वैष्णव संप्रदाय में इसका तिलक लगाना परम पवित्र माना जाता है।
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