श्री बद्रीनाथ धाम
नर और नारायण पर्वतों के मध्य, पावन अलकनंदा के तट पर 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्री बद्रीनाथ धाम भू-वैकुंठ के नाम से विख्यात है, जहां भगवान विष्णु ने जगत कल्याण हेतु सहस्रों वर्षों तक तपस्या की थी।
नर और नारायण पर्वतों के मध्य, पावन अलकनंदा के तट पर 3,133 मीटर की ऊंचाई पर स्थित श्री बद्रीनाथ धाम भू-वैकुंठ के नाम से विख्यात है, जहां भगवान विष्णु ने जगत कल्याण हेतु सहस्रों वर्षों तक तपस्या की थी।
श्री बद्रीनाथ धाम का ऐतिहासिक एवं धार्मिक उल्लेख ऋग्वेद, स्कंद पुराण और महाभारत के वन पर्व में विस्तार से मिलता है। मान्यता है कि महाभारत काल के पश्चात यह पावन विग्रह नारद कुंड में गुप्त हो गया था। 8वीं शताब्दी में अद्वैत वेदांत के महान प्रवर्तक जगद्गुरु आदि शंकराचार्य जी ने नारद कुंड से भगवान बद्रीनारायण की शालिग्राम शिला से निर्मित एक मीटर ऊंची चतुर्भुज स्वयंभू ध्यानमुद्रा मूर्ति को बाहर निकाला और गरुड़ गुफा के समीप स्थापित किया।
कालांतर में 16वीं शताब्दी में गढ़वाल के तत्कालीन महाराजा ने वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण कराया। मंदिर की वास्तुकला पहाड़ी काष्ठ और नक्काशीदार पत्थरों का अद्भुत समन्वय है। इसका मुख्य प्रवेश द्वार 'सिंह द्वार' कहलाता है, जो अत्यंत रंगीन और आकर्षक है। मंदिर तीन प्रमुख भागों में विभाजित है—गर्भगृह, दर्शन मंडप और सभा मंडप। मुख्य गर्भगृह में भगवान बद्रीनारायण पद्मासन मुद्रा में विराजित हैं, जिनके दाहिनी ओर कुबेर, गरुड़ और नारायण तथा बाईं ओर नर और नारायण के विग्रह हैं। मंदिर के शिखर पर स्वर्ण कलश सुशोभित है, जो दूर से ही अलौकिक आभा बिखेरता है।
स्कंद पुराण के केदारखंड के अनुसार, जब भगवान नारायण ने इस शीतल हिमालयी क्षेत्र में कठोर तपस्या आरंभ की, तब भयंकर हिमपात और कड़ाके की ठंड पड़ने लगी। भगवान को बर्फ और शीतल पवन से बचाने के लिए माता लक्ष्मी ने स्वयं एक विशाल बद्री (बेर) के वृक्ष का रूप धारण कर लिया और भगवान के ऊपर छत्र बनकर खड़ी हो गईं। वर्षों तक शीत, धूप और वर्षा सहने के कारण माता लक्ष्मी का रूप पीला पड़ गया।
जब भगवान विष्णु की समाधि टूटी और उन्होंने माता लक्ष्मी के इस अगाध समर्पण को देखा, तो अत्यंत द्रवित होकर कहा—'हे देवी! तुमने मेरी रक्षा हेतु बद्री वृक्ष बनकर जो कष्ट सहा है, उसके कारण आज से यह क्षेत्र 'बद्रिकाश्रम' और मुझे 'बद्रीनाथ' के नाम से जाना जाएगा। यहां मेरी पूजा से पूर्व तुम्हारी भक्ति का स्मरण होगा।' इसी पावन भूमि पर वेदव्यास जी ने महाभारत और 18 पुराणों की रचना की थी, जिसके साक्ष्य व्यास गुफा के रूप में आज भी विद्यमान हैं।
बद्रीनाथ धाम के दर्शन मात्र से मनुष्य जन्म-मरण के चक्र से मुक्त होकर मोक्ष पद को प्राप्त करता है। पद्म पुराण में कहा गया है—'बहूनि सन्ति तीर्थानि दिवि भूमौ रसायाम्। बद्रीसदृशं तीर्थं न भूतं न भविष्यति॥' अर्थात स्वर्ग, पृथ्वी और पाताल में अनेक तीर्थ हैं, परंतु बद्रीनाथ जैसा तीर्थ न कभी हुआ है, न कभी होगा।
मंदिर के नीचे स्थित प्राकृतिक गर्म गंधक युक्त जल कुंड, जिसमें बर्फीली ठंड में भी स्नान करने से समस्त शारीरिक व्याधियां दूर होती हैं।
अलकनंदा तट पर स्थित वह पावन शिलाखंड, जहां पितरों का श्राद्ध व पिंडदान करने से उन्हें अक्षय तृप्ति और मोक्ष मिलता है।
भारत का प्रथम गांव माणा, जहां महर्षि वेदव्यास ने भगवान गणेश के सहयोग से महाभारत महाकाव्य लिपिबद्ध किया था।
स्वर्गारोहण के समय महाबली भीम द्वारा सरस्वती नदी के ऊपर रखा गया विशालकाय शिलाखंड।
मंदिर से 3 किमी ऊपर स्थित वह पवित्र स्थल जहां भगवान श्री नारायण के पावन चरण चिन्ह अंकित हैं।
सर्वप्रथम अलकनंदा तट पर तप्त कुंड के गर्म जल में पवित्र स्नान करें। तत्पश्चात स्वच्छ वस्त्र धारण कर मंदिर गर्भगृह में प्रवेश करें। बद्रीनारायण को तुलसी दल, माखन-मिश्री व चने की दाल का भोग प्रिय है। कपाट प्रातः 4:30 बजे महाभिषेक के साथ खुलते हैं और रात्रि 9:00 बजे शयन आरती के उपरांत बंद होते हैं। मंदिर प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया के आसपास खुलता है और भाई दूज (अक्टूबर-नवंबर) पर शीतकाल हेतु बंद होता है।
| आरती / पूजा अनुष्ठान | निर्धारित समय |
|---|---|
| महाभिषेक व मंगल आरती | प्रातः 04:30 - 06:30 |
| सामान्य दर्शन (बालभोग उपरांत) | प्रातः 07:00 - 12:00 |
| शाम की आरती व गीत गोविंद पाठ | संध्या 06:00 - 07:30 |
| शयन आरती व कपाट बंदी | रात्रि 08:30 - 09:00 |
निकटतम हवाई अड्डा जौलीग्रांट (देहरादून) लगभग 314 किमी दूर है। देहरादून से बद्रीनाथ हेतु हेलीकॉप्टर सेवाएं भी उपलब्ध हैं।
निकटतम रेलवे स्टेशन ऋषिकेश (लगभग 295 किमी) और हरिद्वार (लगभग 320 किमी) हैं। यहां से बद्रीनाथ के लिए नियमित बसें व टैक्सियां चलती हैं।
ऋषिकेश से बद्रीनाथ तक राष्ट्रीय राजमार्ग NH-58 देवप्रयाग, श्रीनगर, रुद्रप्रयाग, कर्णप्रयाग और जोशीमठ होते हुए सीधे पहुंचता है।
मई से जून तथा सितंबर से अक्टूबर का समय यात्रा हेतु सर्वोत्तम है। जुलाई-अगस्त में मानसूनी वर्षा के कारण सावधानी आवश्यक है।
बद्रीनाथ में जीएमवीएन (GMVN) टूरिस्ट लॉज, विभिन्न राज्यों की धर्मशालाएं, मठ, आश्रम और निजी होटल प्रचुर मात्रा में उपलब्ध हैं।
इस पावन तीर्थ के अधिष्ठाता देव की आराधना एवं नित्य पाठ हेतु प्रमुख स्तोत्र, मंत्र एवं आरतियां:
बद्रीनाथ धाम के कपाट प्रतिवर्ष अक्षय तृतीया (अप्रैल-मई) के शुभ अवसर पर खुलते हैं और शीतकाल में भारी बर्फबारी के कारण भाई दूज (नवंबर) पर 6 माह हेतु बंद कर दिए जाते हैं।
बाहर शून्य डिग्री तापमान होने पर भी तप्त कुंड का प्राकृतिक गंधक युक्त जल लगभग 55°C से 60°C तक गर्म रहता है, जिसमें औषधीय गुण होते हैं।
हाँ, उत्तराखंड सरकार द्वारा चार धाम यात्रा हेतु बायोमेट्रिक/ऑनलाइन ई-रजिस्ट्रेशन अनिवार्य किया गया है।
बद्रीनाथ धाम के मुख्य पुजारी को 'रावल' कहा जाता है, जो परंपरागत रूप से दक्षिण भारत के केरल राज्य के नंबूदरीपाद ब्राह्मण परिवार से होते हैं।
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