कालभैरवाष्टकम् (Kalabhairav Ashtakam)
आदि शंकराचार्य जी द्वारा रचित कालभैरवाष्टकम् काशी के अधिपति कालभैरव की परम स्तुति है। इसके पाठ से काल-भय, अकाल मृत्यु, शत्रुभय और ग्रहदोषों का समूल नाश होता है।
❓ कालभैरवाष्टकम् (Kalabhairav Ashtakam) से संबंधित मुख्य प्रश्नोत्तर (FAQs)
1. कालभैरवाष्टकम् के पाठ से क्या लाभ होते हैं?
इसके पाठ से भूत-प्रेत बाधा, तंत्र बाधा, शनि और राहु की महादशा का अशुभ प्रभाव समाप्त होता है तथा मन निर्भय होता है।
🪔 प्रभु वंदन की दृष्टि से: भय का रक्षक रूप — काशी कोतवाल का संदेश
काल भैरव को 'काशी कोतवाल' कहा जाता है — अर्थात् वे भय उत्पन्न करने वाले नहीं, बल्कि नगर की रक्षा करने वाले रक्षक हैं। यह विचार महत्वपूर्ण है क्योंकि भैरव का रौद्र स्वरूप पहली दृष्टि में भयभीत कर सकता है, परन्तु वास्तव में यह रूप अनुशासन और सुरक्षा का प्रतीक है, विनाश का नहीं।
यह स्तोत्र हमें एक उपयोगी भेद सिखाता है — कठोरता और क्रूरता में अंतर। एक अच्छा रक्षक, चाहे वह माता-पिता हों, शिक्षक हों या कोई नियम-व्यवस्था, कभी-कभी कठोर प्रतीत होता है, परन्तु उसका उद्देश्य संरक्षण होता है। भैरव की उपासना हमें अनुशासन को भय के रूप में नहीं, बल्कि सुरक्षा के रूप में देखना सिखाती है।
आदि शंकराचार्य जैसे ज्ञानमार्गी आचार्य द्वारा भी भैरव की स्तुति रचे जाने का तथ्य दिखाता है कि भक्ति और ज्ञान परस्पर विरोधी नहीं — भय के देवता की भी गहन दार्शनिक समझ के साथ उपासना की जा सकती है, केवल अंधविश्वास से नहीं।
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