श्री मथुरा धाम
सप्त मोक्ष पुरियों में द्वितीय, भगवान श्री कृष्ण की पावन जन्मभूमि मथुरा ब्रजमंडल का हृदय स्थल है। पावन यमुना के तट पर स्थित यह वह दिव्य भूमि है जहां कंस के कारागार में साक्षात् भगवान नारायण ने चतुर्भुज रूप में अवतार लिया था।
सप्त मोक्ष पुरियों में द्वितीय, भगवान श्री कृष्ण की पावन जन्मभूमि मथुरा ब्रजमंडल का हृदय स्थल है। पावन यमुना के तट पर स्थित यह वह दिव्य भूमि है जहां कंस के कारागार में साक्षात् भगवान नारायण ने चतुर्भुज रूप में अवतार लिया था।
मथुरा का इतिहास महाभारत कालीन है। भगवान श्री कृष्ण के प्रपौत्र वज्रनाभ ने सर्वप्रथम केशवदेव मंदिर का निर्माण कराया था। गुप्त काल में सम्राट चंद्रगुप्त विक्रमादित्य ने यहां एक विशाल प्रस्तर मंदिर बनवाया। 17वीं शताब्दी में ओरछा नरेश राजा वीर सिंह देव बुंदेला ने 33 लाख रुपयों की लागत से यहां एक भव्य मंदिर बनवाया था, जिसे औरंगजेब ने 1670 में ध्वस्त कर दिया था।
स्वतंत्रता के पश्चात महामना मदन मोहन मालवीय, जुगल किशोर बिड़ला और संत अखंडानंद जी के प्रयासों से वर्तमान भव्य श्री कृष्ण जन्मस्थान परिसर का पुनर्निर्माण हुआ। परिसर में मूल कंस कारागार (गर्भ गृह), भव्य केशवदेव मंदिर, माता योगमाया मंदिर और भागवत भवन स्थित हैं। भागवत भवन की दीवारों पर संपूर्ण श्रीमद्भागवत महापुराण के श्लोक और श्री कृष्ण की बाल लीलाएं संगमरमर पर उत्कीर्ण हैं।
श्रीमद्भागवत महापुराण के दशम स्कंध के अनुसार, मथुरा के क्रूर राजा कंस ने अपनी चचेरी बहन देवकी के विवाह के समय आकाशवाणी सुनी कि 'देवकी का आठवां पुत्र तेरा काल होगा।' भयभीत कंस ने देवकी और वसुदेव को कारागार में बंद कर दिया और उनके छह नवजात शिशुओं की निर्दयता से हत्या कर दी। सातवें गर्भ (बलराम जी) को योगमाया ने रोहिणी के गर्भ में संचरित किया।
भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की घनघोर अंधेरी मध्यरात्रि में, जब रोहिणी नक्षत्र था और मूसलाधार वर्षा हो रही थी, तब भगवान श्री कृष्ण ने देवकी के गर्भ से शंख, चक्र, गदा और पद्म धारण किए हुए चतुर्भुज रूप में अवतार लिया। उसी क्षण कारागार के सभी पहरेदार सो गए और लोहे के कपाट व बेड़ियां स्वतः खुल गईं। वसुदेव जी ने बालक कृष्ण को सूप में रखकर उफनती यमुना पार की और गोकुल में नंदबाबा के घर यशोदा जी के पास पहुंचा दिया।
मथुरा में क्षण भर का निवास भी मोक्ष प्रदान करता है—'मथुरा नाम नगरी सर्वपापप्रणाशिनी।' विश्राम घाट पर यमुना स्नान और यम द्वितीया पर भाई-बहन का यमुना स्नान अकाल मृत्यु और यमलोक के भय से सर्वथा मुक्त कर देता है।
कंस का प्राचीन कारागार जहां मध्यरात्रि में भगवान श्री कृष्ण का प्राकट्य हुआ था। यहां अखंड ज्योति निरंतर प्रज्वलित रहती है।
यमुना का सबसे पवित्र घाट जहां कंस वध के उपरांत भगवान श्री कृष्ण और बलराम जी ने विश्राम किया था। यहां की संध्या आरती अलौकिक होती है।
मथुरा नगर के मध्य स्थित सेठ गोकुलदास द्वारा 1814 में निर्मित भव्य मंदिर, जहां हिंडोला और होली उत्सव प्रसिद्ध हैं।
जन्मस्थान के समीप स्थित विशाल कुंड, जहां माता देवकी भगवान श्री कृष्ण के वस्त्र धोया करती थीं।
यमुना तट पर स्थित प्राचीन दुर्ग के अवशेष, जहां महाभारत काल में कंस का राजमहल था।
सर्वप्रथम विश्राम घाट पर यमुना जी का आचमन व स्नान करें। इसके उपरांत श्री कृष्ण जन्मस्थान परिसर में प्रवेश करें (इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं पूर्णतः लॉकर में जमा होती हैं)। सर्वप्रथम मूल कारागार गर्भगृह, तदुपरांत भागवत भवन और केशवदेव मंदिर के दर्शन करें। इसके बाद द्वारकाधीश मंदिर के दर्शन करें।
| आरती / पूजा अनुष्ठान | निर्धारित समय |
|---|---|
| मंगला आरती (गर्भगृह) | प्रातः 05:30 - 06:00 |
| माखन-मिश्री भोग आरती | प्रातः 08:00 - 08:30 |
| दोपहर राजभोग आरती | दोपहर 12:00 - 12:30 |
| संध्या आरती (भागवत भवन) | संध्या 06:30 - 07:00 |
| शयन आरती व कपाट बंदी | रात्रि 09:00 - 09:30 |
निकटतम हवाई अड्डे आगरा (लगभग 60 किमी) और इंदिरा गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा (नई दिल्ली, लगभग 150 किमी) हैं।
मथुरा जंक्शन (MTJ) उत्तर मध्य रेलवे का विशाल जंक्शन है, जहां से भारत के किसी भी कोने से सीधी सुपरफास्ट ट्रेनें उपलब्ध हैं।
दिल्ली-आगरा यमुना एक्सप्रेसवे और NH-19 द्वारा दिल्ली से मात्र 2.5 घंटे में मथुरा पहुंचा जा सकता है।
अक्टूबर से मार्च का मौसम सुखद है। भाद्रपद की कृष्ण जन्माष्टमी और फाल्गुन की ब्रज होली में संपूर्ण विश्व से श्रद्धालु आते हैं।
मथुरा और वृंदावन में इस्कॉन गेस्ट हाउस, बिड़ला धर्मशाला, कान्हा माखन रिसॉर्ट और सैकड़ों धर्मशालाएं व होटल उपलब्ध हैं।
इस पावन तीर्थ के अधिष्ठाता देव की आराधना एवं नित्य पाठ हेतु प्रमुख स्तोत्र, मंत्र एवं आरतियां:
मथुरा और वृंदावन के मध्य मात्र 10 से 12 किलोमीटर की दूरी है, जिसे ऑटो, ई-रिक्शा या टैक्सी द्वारा 20 मिनट में तय किया जा सकता है।
यम द्वितीया (भाई दूज) पर यमराज अपनी बहन यमुना से मिलने आए थे। मान्यता है कि इस दिन भाई-बहन का हाथ पकड़कर विश्राम घाट पर स्नान करने से यम यातना से मुक्ति मिलती है।
सुरक्षा कारणों से जन्मस्थान परिसर में मोबाइल फोन, कैमरा, स्मार्टवॉच, चमड़े का बेल्ट, तंबाकू और इलेक्ट्रॉनिक उपकरण पूर्णतः प्रतिबंधित हैं। बाहर क्लॉक रूम में जमा करने की व्यवस्था है।
मथुरा, वृंदावन, गोवर्धन, बरसाना, नंदगांव और मधुवन सहित लगभग 250 किमी के ब्रज क्षेत्र की परिक्रमा को 84 कोस परिक्रमा कहा जाता है, जिसमें भगवान की संपूर्ण लीला स्थली समाहित है।
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