श्री हनुमान जी सुंदरकांड

सम्पूर्ण सुंदरकांड पाठ (दोहा १ से ६०)

श्री रामचरितमानस • पंचम सोपान • रचयिता: गोस्वामी तुलसीदास जी

भगवान श्री राम की कृपा और श्री संकटमोचन हनुमान जी के असीम पराक्रम, भक्ति और विजय का साक्षात् पावन अमृत-काव्य।

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॥ श्री जानकीवल्लभो विजयते ॥

मङ्गलाचरणम्

शान्तं शाश्वतमप्रमेयमनघं निर्वाणशान्तिप्रदं ब्रह्माशम्भुफणीन्द्रसेव्यमनिशं वेदान्तवेद्यं विभुम्। रामाख्यं जगदीश्वरं सुरगुरुं मायामनुष्यं हरिं वन्देऽहं करुणाकरं रघुवरं भूपालचूडामणिम्॥ १ ॥ नान्या स्पृहा रघुपते हृदयेऽस्मदीये सत्यं वदामि च भवानखिलान्तरात्मा। भक्तिं प्रयच्छ रघुपुंगव निर्भरां मे कामादिदोषरहितं कुरु मानसं च॥ २ ॥ अतुलितबलधामं हेमशैलाभदेहं दनुजवनकृशानुं ज्ञानिनामग्रगण्यम्। सकलगुणनिधानं वानराणामधीशं रघुपतिप्रियभक्तं वातजातं नमामि॥ ३ ॥
भावार्थ: जो शांत, सनातन, अप्रमेय (प्रमाणों से परे), निष्पाप, मोक्ष रूप परम शांति देने वाले, ब्रह्मा, शम्भु और शेषनाग द्वारा नित्य सेवित, वेदान्त द्वारा जानने योग्य, सर्वव्यापी, देवताओं में श्रेष्ठ, माया से मनुष्य रूप धारण करने वाले, करुणा की खान, रघुकुल शिरोमणि श्री राम हैं, उन जगदीश्वर को मैं प्रणाम करता हूँ। हे अतुलनीय बल के धाम, सुवर्ण पर्वत के समान कांति वाले, राक्षसों के वन को भस्म करने वाले, ज्ञानियों में अग्रगण्य, पवनपुत्र श्री हनुमान! आपको मेरा कोटि-कोटि नमन।
🕉️ सर्ग १: हनुमान जी का समुद्र लंघन एवं लंका प्रवेश (दोहा १ - ५)
॥ दोहा 1 एवं चौपाई ॥
जामवन्त के बचन सुहाए। सुनि हनुमंत हृदय अति भाए॥ तब लगि मोहि परिखेहु तुम्ह भाई। सहि दुखु कंद मूल फल खाई॥ जब लगि आवौं सीतहि देखी। होइहि काजु मोहि हरष बिसेषी॥ यह कहि नाइ सबन्हि कहुं माथा। चलेउ हरषि हियं धरि रघुनाथा॥
सिंधु तीर एक भूधर सुंदर। कौतुक कूदी चढ़ेउ ता ऊपर॥ बार बार रघुबीर संभारी। तरकेउ पवनतनय बल भारी॥ १ ॥
हिंदी भावार्थ: जाम्बवान् के सुंदर वचनों को सुनकर हनुमान जी के मन में अत्यंत हर्ष हुआ। उन्होंने कहा—हे भाइयों! जब तक मैं जानकी जी को देखकर वापस न आ जाऊं, तब तक कंद-मूल-फल खाकर दुःख सहते हुए मेरी प्रतीक्षा करना। मुझे पूरा विश्वास है कि श्री राम कृपा से कार्य अवश्य सिद्ध होगा। यह कहकर सबको प्रणाम कर और हृदय में रघुनाथ जी को धारण कर हनुमान जी हर्षित होकर चले और समुद्र तट के सुंदर पर्वत से वेगपूर्वक उछलकर आकाश मार्ग में उड़ चले।
॥ दोहा 2 एवं चौपाई ॥
जेहिं गिरि चरन देइ हनुमंता। चलेउ सो गा पाताल तुरंता॥ जिमि अमोघ रघुपति कर बाना। एही भांति चलेउ हनुमाना॥ जलनिधि रघुपति दूत बिचारी। तैं मैनाक होहि श्रमहारी॥ हनूमान तेहि परसा कर पुनि कीन्ह प्रनाम। राम काजु कीन्हे बिनु मोहि कहाँ बिश्राम॥
जात पवनसुत देवन्ह देखा। जानैं कहुं बल बुद्धि बिसेषा॥ सुरसा नाम अहिन कै माता। पठइन्हि आइ कही तेहिं बाता॥ २ ॥
हिंदी भावार्थ: जिस पर्वत पर पैर रखकर हनुमान जी उड़े, वह तुरंत पाताल में धंस गया। हनुमान जी श्री राम जी के अचूक बाण के समान तीव्र गति से चले। समुद्र ने उन्हें श्री राम का दूत समझकर मैनाक पर्वत से कहा कि तुम हनुमान जी के विश्रामदाता बनो। हनुमान जी ने मैनाक को केवल हाथ से स्पर्श कर प्रणाम किया और कहा—श्री राम जी का कार्य किए बिना मेरे लिए विश्राम कहाँ!
॥ दोहा 3 एवं चौपाई ॥
आजु सुरन्ह मोहि दीन्ह अहारा। सुनत बचन कह पवनकुमारा॥ राम काजु करि आवौं माई। सत्य कहौं मुख मेलिहौं आई॥ जबहिं जतन कछु कीन्ह न जाई। ग्रसि न काहु मोहि बड़ताई॥ जोजन भरि तेहिं बदनु पसारा। कपि तनु कीन्ह दुगुन बिस्तारा॥ सोलह जोजन मुख तेहिं ठयऊ। तुरत पवनसुत बत्तीस भयऊ॥ जस जस सुरसा बदनु बढ़ावा। तासु दून कपि रूप देखावा॥ सत जोजन तेहिं आनन कीन्हा। अति लघु रूप पवनसुत लीन्हा॥ बदन पइठि पुनि बाहेर आवा। मागा बिदा ताहि सिरु नावा॥
मोहि सुरन्ह जेहि लागी पठावा। बुधि बल मरमु तोर मैं पावा॥ राम काजु सबु करिहहु तुम्ह बल बुद्धि निधान। आसिष देइ गई सो हरषि चलेउ हनुमान॥ ३ ॥
हिंदी भावार्थ: देवताओं ने हनुमान जी की परीक्षा लेने हेतु सर्पों की माता सुरसा को भेजा। सुरसा ने हनुमान जी को ग्रास बनाना चाहा। हनुमान जी ने कहा कि मैं जानकी जी की सुध लेकर स्वयं आपके मुख में आ जाऊंगा। जब सुरसा नहीं मानी और उसने अपना मुख एक योजन फैलाया, तब हनुमान जी ने दो गुना रूप बढ़ाया। जैसे-जैसे सुरसा ने मुख बढ़ाया, हनुमान जी ने उससे दूना रूप दिखाया। जब उसने सौ योजन मुख किया, तब हनुमान जी ने अति सूक्ष्म रूप बनाकर उसके मुख में प्रवेश कर तुरंत बाहर निकल आए और हाथ जोड़कर विदा मांगी। सुरसा ने प्रसन्न होकर आशीर्वाद दिया कि आप बल-बुद्धि के निधान हैं, श्री राम का सब कार्य सिद्ध करेंगे।
॥ दोहा 4 एवं चौपाई ॥
निblackसिंधु महुं एक सिंधु कराली। माया करि नभ गहि खग खाली॥ जीव जंतु जे गगन उड़ाहीं। जल बिलोकि तिन्ह कै परिछाहीं॥ गहइ छाहं सक सो न उड़ाई। एहि बिधि सदा गगनचर खाई॥ सोइ छल हनूमान कहं कीन्हा। तासु कपटु कपि तुरतहिं चीन्हा॥ ताहि मारि मारुतसुत बीरा। बारिधि पार गयउ मतिधीरा॥ तहां जाइ देखी बहु सोभा। बन कुसुमित मन मुनि मन लोभा॥
उहाँ जाइ दीखि कपि लंका। अति विचित्र कछु कहि नहिं जाई॥ कनक कोट बिचित्र मनि कृत सुंदरायतना घना। चौहट्ट हट्ट सुबट्ट बीथीं चारु पुर बहु बिधि बना॥ ४ ॥
हिंदी भावार्थ: समुद्र में एक सिंहिका नामक राक्षसी रहती थी, जो आकाश में उड़ते हुए जीवों की परछाईं पकड़कर उन्हें खा जाती थी। उसने हनुमान जी के साथ भी वही छल करना चाहा, परंतु बुद्धिमान मारुति ने उसका कपट पहचानकर एक ही प्रहार में उसका वध कर दिया और समुद्र पार कर लंका के तट पर जा पहुंचे। वहाँ पहुंचकर उन्होंने कंचन की लंकापुरी की विचित्र शोभा देखी, जिसके स्वर्ण-कोट मणियों से जड़े हुए थे।
॥ दोहा 5 एवं चौपाई ॥
मंदिर मंदिर प्रति करि सोधा। देखे जहं तहं अगनित जोधा॥ गयउ दसानन मंदिर माहीं। अति बिचित्र कहि जात सो नाहीं॥ सयन किए देखा कपि तेही। मंदिर महुं न दीखि बैदेही॥ भवन एक पुनि दीख सुहावा। हरि मंदिर तहं भिन्न बनावा॥
रामायुध अंकित गृह सोभा बरनि न जाइ। नव तुलसिका बृंद तहं देखि हरषि कपिराइ॥ ५ ॥
हिंदी भावार्थ: हनुमान जी लंका के महल-महल में जानकी जी की खोज करने लगे। उन्होंने रावण के महल में जाकर देखा, परंतु वहाँ जानकी जी नहीं मिलीं। तभी उन्हें एक ऐसा सुंदर भवन दिखाई दिया, जिसमें भगवान श्री हरि का एक अलग मंदिर बना था। उस घर पर श्री राम के धनुष-बाण के चिह्न अंकित थे और वहाँ तुलसी के पावन पौधे लगे थे, जिसे देखकर हनुमान जी का हृदय हर्षित हो उठा।
🕉️ सर्ग २: विभीषण मिलन एवं लंकिनी प्रसंग (दोहा ६ - १०)
॥ दोहा 6 एवं चौपाई ॥
लंका निसिचर निकर निवासा। इहां कहां सज्जन कर बासा॥ मन महुं तरक करैं कपि लागा। तेहीं समय बिभीषनु जागा॥ राम राम तेहिं सुमिरन कीन्हा। हृदयँ हरष कपि सज्जन चीन्हा॥ एहि सन हठि करिहउं पहिचानी। साधु ते होइ न कारज हानी॥ बिप्र रूप धरि बचन सुनाए। सुनत बिभीषण उठि तहं आए॥ करि प्रनाम पूंछि कुसलाता। बिप्र कहहु निज कथा बुझाता॥
की तुम्ह हरि दासन्ह महं कोई। मोरें हृदय प्रीति अति होई॥ की तुम्ह रामु दीन अनुरागी। आयहु मोहि करन बड़भागी॥ ६ ॥
हिंदी भावार्थ: हनुमान जी विचार करने लगे कि राक्षसों के गढ़ लंका में यह सज्जन कौन रहता है? तभी प्रातःकाल विभीषण जी जागे और उन्होंने 'राम-राम' का पावन स्मरण किया। यह सुनकर हनुमान जी ने जान लिया कि यह कोई परम भगवद्-भक्त हैं। हनुमान जी ने विप्र (ब्राह्मण) का रूप धारण किया। विभीषण जी ने सादर प्रणाम कर पूछा—हे विप्रवर! क्या आप श्री हरि के भक्तों में से कोई हैं अथवा दीनों पर कृपा करने वाले साक्षात् श्री राम ही मुझे बड़भागी बनाने पधारे हैं?
॥ दोहा 7 एवं चौपाई ॥
तब हनुमंत कही सब राम कथा निज नाम। सुनत बचन जुगल लोचन जल पुलक तन सुठि अभिराम॥ अब मोहि भा भरोस हनुमंता। बिनु हरिकृपा मिलहिं नहिं संता॥ जौ रघुबीर अनुग्रह कीन्हा। तौ तुम्ह मोहि दरसु हठि दीन्हा॥ सुनहु उमा तेहि राम सुभाऊ। राना रंक न जानइ काऊ॥
तात मोर कछु पुन्य पुंजा। जा सन मिल्यो रघुपति पद कंजा॥ अब सोइ जतन करहु कपिराई। जेहि बिधि सीतहि देखौं जाई॥ ७ ॥
हिंदी भावार्थ: तब हनुमान जी ने अपना नाम और श्री राम जी का सारा प्रसंग सुनाया। यह सुनते ही विभीषण जी के दोनों नेत्रों से प्रेमाश्रु बहने लगे और उनका रोम-रोम रोमांचित हो गया। विभीषण जी ने कहा—हे हनुमान जी! अब मुझे पूर्ण विश्वास हो गया कि भगवान की अहैतुकी कृपा के बिना संतों का समागम नहीं मिलता। इसके बाद विभीषण जी ने जानकी जी के अशोक वाटिका में होने का रहस्य बताया।
॥ दोहा 8 एवं चौपाई ॥
कपि करि बिदा चलेउ हनुमाना। जहं सो रहइ सीत पहिं जाना॥ अशोक बाटिका कपि गयउ। तरु कोटर महुं बैठत भयउ॥ कृस तन सीस जटा एक बेनी। जपइ हृदयँ रघुपति गुन सेनी॥ निज पद नयन दिएं मन राम पद लीन। सकल काम तजि जनकसुता केवल राम अधीन॥
दीन मलीन उदास मन रोवति रघुपति ध्यान। कपि मन कीन्ह बिचार तब करौं न काजु बिहान॥ ८ ॥
हिंदी भावार्थ: विभीषण जी से विदा लेकर हनुमान जी अशोक वाटिका में पहुंचे। वहाँ उन्होंने देखा कि माता सीता एक वृक्ष के नीचे बैठी हैं। उनका शरीर अत्यंत कृश हो गया है, सिर पर एक वेणी की जटा है और वे निरंतर हृदय में श्री रघुनाथ जी के गुणों का जप कर रही हैं। वे समस्त संसार को त्यागकर केवल श्री राम जी के चरणों में लीन हैं।
॥ दोहा 9 एवं चौपाई ॥
तेहि अवसर रावनु तहं आवा। संग नारि बहु किएं बनावा॥ बहु बिधि खल सीतहि समुझावा। साम दान भय भेद देखावा॥ कह रावनु सुनु सुमुखि सयानी। मंदोदरी आदि सब रानी॥ तव अनुचरीं करउं पन मोरा। एक बार बिलोकु मम ओरा॥ तृन धरि ओट कहति बैदेही। सुमिरि अवधपति परम सनेही॥
सुनु दसमुख खद्योत प्रकासा। कबहुं कि नलिनी करइ बिकासा॥ अस मन समुझु कहति जानकी। खल सुधि नहिं रघुबीर बान की॥ ९ ॥
हिंदी भावार्थ: उसी समय रावण अनेक स्त्रियों के साथ सज-धजकर अशोक वाटिका में आया। उसने साम, दाम, भेद और भय दिखाकर सीता जी को प्रलोभन देने का यत्न किया और कहा कि मेरी ओर एक बार देखो, मैं मंदोदरी सहित सभी रानियों को तुम्हारी दासी बना दूंगा। सीता जी ने एक तिनके की ओट लेकर परम स्नेही प्रभु श्री राम का स्मरण करते हुए कहा—अरे दुष्ट रावण! क्या जुगनू के प्रकाश से कभी कमलिनी खिल सकती है? तू अभी श्री रघुवीर के बाणों के प्रताप को नहीं जानता।
॥ दोहा 10 एवं चौपाई ॥
सठ सूने हरि आनिहि मोही। अधम निलज्ज लाज नहिं तोही॥ द्वौ मास दिवस महं जो नहिं मानसि मोरा कहा। तौ असि काढ़ि तोरि कटिहउँ माथा जो असि रहा॥ इति कहि क्रूर गयउ निज धामा। त्रिजटा नाम निसिचरी नामा॥ सो सीता पहिं आइ कही सब सपने की बाता। लंक जारि कपि कीन्ह निपाता॥
त्रिजटा सन बोलिं तब सीता। सुनु माता दुख हरहु बिनीता॥ तजिहिं देह अब मोहि न अंदेसा। पावहुं बेगि राम संदेसा॥ १० ॥
हिंदी भावार्थ: सीता जी के कठोर वचन सुनकर क्रोधी रावण ने तलवार खींच ली और दो महीने की मोहलत देकर अपने महल लौट गया। तब त्रिजटा नामक धर्मात्मा राक्षसी ने सब राक्षसियों को अपना स्वप्न सुनाया कि एक वानर ने संपूर्ण लंका जला दी और श्री राम की विजय हुई। सीता जी ने त्रिजटा से कहा कि मुझे शीघ्र अग्नि लाकर दो, ताकि मैं यह देह त्याग सकूं, परंतु त्रिजटा ने उन्हें धैर्य बंधाया।
🕉️ सर्ग ३: सीता-हनुमान संवाद एवं मुद्रिका प्रदान (दोहा ११ - २०)
॥ दोहा 11 एवं चौपाई ॥
कपि करि हृदयँ बिचार दीन्हि मुद्रिका डारी तब। जनु असोक अंगार दीन्ह हरषि उठि कर गहेउ॥ तब देखी मुद्रिका मनोहर। राम नाम अंकित अति सुंदर॥ चकित चितव मुदरी पहिचानी। हरष बिषाद हृदयँ अकुलानी॥ जीति को सकइ अजय रघुराई। माया तें असि रचि नहिं जाई॥
हरषित हृदयँ बिचार कपि मन महुं कहत सुभाय। रामचंद्र गुन बरनैं लाग्यो सुनत बिषाद नसाय॥ ११ ॥
हिंदी भावार्थ: तब हनुमान जी ने विचार करके वृक्ष की डाल से प्रभु श्री राम की मुद्रिका (अंगूठी) नीचे गिरा दी। सीता जी ने उसे अशोक का दिया अंगारा समझकर हर्षित होकर हाथ में उठा लिया। जब उन्होंने मुद्रिका पर 'श्री राम' नाम अंकित देखा, तो वे विस्मित हो गईं। वे सोचने लगीं कि अजेय श्री रघुनाथ जी की मुद्रिका को कोई जीत नहीं सकता और यह माया से भी नहीं बन सकती। तभी हनुमान जी ने मधुर वाणी में श्री रामचन्द्र जी के पावन गुणों का गान प्रारंभ किया।
॥ दोहा 12 एवं चौपाई ॥
श्रवन सुनत अमृतमय बानी। चकित चितइ कह मृदु मुस्काना॥ को कहि कथा अमिय रस सानी। त्रिविध ताप भव संसय हानी॥ तपि साखा ते प्रगट भयउ कपि। देखि जनकसुता बिस्मित भई सुचि॥ अति लघु रूप कीन्ह हनुमाना। पाछे सिरु नाइ चरन लपटाना॥
राम दूत मैं मातु जानकी। सत्य सपथ करुनानिधान की॥ यह मुद्रिका मातु मैं आनी। दीन्हि राम तुम्ह कहं सहिदानी॥ १२ ॥
हिंदी भावार्थ: कानों में अमृतमयी कथा सुनकर सीता जी विस्मित होकर देखने लगीं। तब हनुमान जी वृक्ष की शाखा से उतरकर सामने प्रकट हुए। सीता जी को संशय में देखकर हनुमान जी ने अति सूक्ष्म रूप धारण कर उनके चरणों में शीश नवाया और कहा—हे माता जानकी! मैं करुणानिधान श्री राम जी का दूत हूँ। मैं सत्य की शपथ खाकर कहता हूँ कि यह मुद्रिका मुझे स्वयं प्रभु श्री राम ने आपकी पहचान के लिए दी है।
॥ दोहा 13 एवं चौपाई ॥
कपिहि बिलोकि सनेह बिसेषा। पुलक गात लोचन जल देखा॥ कहहु कपि कुसल कृपानिधि केरी। सुधि कहुं करत दीन जन हेरी॥ अंगद नील नल सुग्रीवा। कहहु सबै बानर बल सींवा॥ कह कपि सबहि कुसल रघुराई। तुम्हरेहि बिरहँ बिकल रघुराई॥
कहेहु सुधि मातु मोहि रघुनायक। लछिमन अनुज सहित सुखदायक॥ राम बिरह अति बिकल सरीरा। सुनहु मातु कछु धीर धरीरा॥ १३ ॥
हिंदी भावार्थ: हनुमान जी के वचन सुनकर सीता जी के नयनों से प्रेम के अश्रु छलक पड़े। उन्होंने प्रभु श्री राम और लक्ष्मण जी का कुशल-क्षेम पूछा। हनुमान जी ने कहा—हे माता! कृपानिधान श्री राम सकुशल हैं, परंतु आपके विरह में उनका हृदय अत्यंत व्याकुल रहता है। वे शीघ्र ही वानर सेना सहित लंका पर चढ़ाई कर आपको मुक्त कराएंगे।
॥ दोहा 14 एवं चौपाई ॥
कपि बचन सुनि सीतहि हरषा। बिकल नयन जलधार बरषा॥ तात कबहुं कपि भालु बिसाला। अइहहिं इहां दलन सुरपाला॥ कपिन्ह हृदयँ संसय अस आहीं। सुनि कपि रूप दीख अति भारी॥ कनक भूधराकार सरीरा। समर भयंकर अतिबल बीरा॥
सीता मन भरोस तब भयऊ। पुनि लघु रूप पवनसुत लयऊ॥ सुनु माता साखामृग नहिं बल बुद्धि बिसाल। प्रभु प्रताप तें गरुड़हि खाइ परम लघु ब्याल॥ १४ ॥
हिंदी भावार्थ: सीता जी ने शंका व्यक्त की कि वानर तो अत्यंत चंचल और छोटे होते हैं, वे इन विशाल राक्षसों से कैसे लड़ेंगे? तब हनुमान जी ने अपने शरीर को सुवर्ण पर्वत (सुमेरु) के समान विशाल और गगनचुंबी रूप में प्रकट किया। यह देखकर सीता जी के मन में पूर्ण विश्वास हो गया। तब हनुमान जी ने पुनः अपना सूक्ष्म रूप धर लिया और कहा—हे माता! प्रभु के प्रताप से छोटा सा सर्प भी गरुड़ को खा सकता है।
॥ दोहा 15 एवं चौपाई ॥
अजहुं नयन जल भरि जानकी। कही कपिहि आसीस सुहाइ॥ अजर अमर गुननिधि सुत होहू। करहुं बहुत रघुनायक छोहू॥ करहुं कृपा प्रभु अस सुनि काना। निर्भर प्रेम मगन हनुमाना॥ बार बार नाइ पद माथा। चलेउ हरषि मुख राम रघाथा॥
मातु मोहि दीजै कछु अहारा। लागेउ भूख मोहि भारी अपारा॥ देखि फलित अति सुंदर बागा। कपिहि भूख अति दारुन लागा॥ १५ ॥
हिंदी भावार्थ: माता सीता ने अत्यंत प्रसन्न होकर हनुमान जी को अमोघ आशीर्वाद दिया—'हे पुत्र! तुम अजर, अमर और समस्त गुणों के निधान बनो, और श्री रघुनाथ जी तुम पर सदा अपार कृपा रखें।' यह आशीर्वाद पाकर हनुमान जी प्रेम-मग्न हो गए। फिर हनुमान जी ने कहा—हे माता! इस सुंदर अशोक वाटिका के मधुर फल देखकर मुझे बड़ी तीव्र भूख लगी है, यदि आपकी आज्ञा हो तो मैं फल खा लूँ।
🕉️ सर्ग ४: अशोक वाटिका विध्वंस एवं अक्षय कुमार वध (दोहा २१ - ३०)
॥ दोहा 21 एवं चौपाई ॥
मातु कीन्हि अनुसासन पावा। कपि तहं जाइ मधुर फल खावा॥ फल खाए अरु बिटप उपारे। रक्षक निसिचर मारि बिडारे॥ कछु मारेसि कछु गयउ पराई। रावन सभा पुकारे जाई॥ नाथ एक आवा कपि भारी। असोक बाटिका उजाड़ी सारी॥
अछयकुमारहिं पठवा रावन। काल समान जोधा महा पावन॥ सूतहिं देखि कपि गर्जन कीन्हा। एकहिं चरन गहि मारि लीन्हा॥ २१ ॥
हिंदी भावार्थ: सीता जी की आज्ञा पाकर हनुमान जी ने वाटिका में जाकर मधुर फल खाए और वृक्षों को उखाड़ना शुरू किया। उन्होंने वाटिका की रक्षा करने वाले राक्षसों को मार भगाया। बचे हुए राक्षसों ने रावण की सभा में जाकर गुहार लगाई कि एक विशाल वानर ने पूरी अशोक वाटिका तहस-नहस कर दी। तब रावण ने अपने प्रतापी पुत्र अक्षय कुमार को भेजा, परंतु हनुमान जी ने एक ही प्रहार में अक्षय कुमार का वध कर दिया।
॥ दोहा 25 एवं चौपाई ॥
सुत बध सुनि दसकंधर क्रोधा। पठवा मेघनाद महा जोधा॥ ब्रह्म अस्त्र तेहिं बांधा बीरा। कपि मन कीन्ह बिचार गभीरा॥ जौं न ब्रह्म सर मानौं ताता। महिमा मिटइ ब्रह्म कृत बाता॥ मुरुछा मिस कपि भूतल गिरा। बांधि दसमुख पहिं लै फिरा॥
कपिहि देखि रावन मुसुकाना। बिहसि कही कछु खल अभिमाना॥ को रे कीस केहि के बल घाला। बन बिधंसि सुत बध करि डाला॥ २५ ॥
हिंदी भावार्थ: पुत्र अक्षय कुमार के वध का समाचार सुनकर रावण आगबबूला हो गया और उसने अपने सबसे बड़े पराक्रमी पुत्र मेघनाद को भेजा। मेघनाद ने जब देखा कि हनुमान जी को किसी अस्त्र से पराजित नहीं किया जा सकता, तब उसने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। हनुमान जी ने विचार किया कि यदि मैं ब्रह्मास्त्र का मान नहीं रखूंगा तो ब्रह्म-महिमा का अपमान होगा, इसलिए वे मूर्छित होने का अभिनय कर भूमि पर गिर पड़े। राक्षस उन्हें बांधकर रावण की सभा में ले आए।
॥ दोहा 30 एवं चौपाई ॥
कह कपि सुनु रावन मदमाना। जाके बल लवलेस समाना॥ जग सिरजति पालति संहरती। माया जासु चर अचर डरती॥ जाके बल लवलेस तें सहसबाहु अरु बालि। जीतेउ समर बली दसमुख तव मान अकालि॥
ताके दूत हम सुनु दसकंधर। जानकिहि आनि देहु रघुबर कहं॥ सरन गयें प्रभु छमिहहिं दोषा। जनि करिहहु रावन मम रोषा॥ ३० ॥
हिंदी भावार्थ: हनुमान जी ने निडर होकर रावण की भरी सभा में गर्जना की—'हे रावण! जिनके लेशमात्र बल से यह संपूर्ण त्रिलोकी उत्पन्न, पालित और संहृत होती है, जिनकी कृपा से सहस्त्रबाहु और बाली जैसे वीरों को तूने जाना है, मैं उन्हीं सर्वेश्वर प्रभु श्री राम का दूत हूँ। अभी भी समय है, जानकी जी को ससम्मान श्री राम को सौंपकर उनकी शरण में चला जा, वे क्षमा के सागर हैं और तुझे अभयदान देंगे।'
🕉️ सर्ग ५: लंका दहन एवं वापसी (दोहा ३१ - ४०)
॥ दोहा 34 एवं चौपाई ॥
कपि कै ममता पूँछ पर सबहिं कहइ समुझाइ। तेल बोरि पट बाँधि पुनि पावक देहु लगाइ॥ पूँछहीन बानर तहं जाई। तब निसिचर सब हंसिहहिं धाई॥ रहा न नगर बसन घृत तेला। बाढ़ी पूँछ कीन्ह कपि खेला॥
कौतुक देखहिं पुर नर नारी। देहिं खिसिस कपिहि सब गारी॥ पावक जरत कपि लघुरूप कीन्हा। बंधन काटि कनक गिरि लीन्हा॥ ३४ ॥
हिंदी भावार्थ: रावण ने क्रोध में भरकर आज्ञा दी कि वानरों को अपनी पूंछ से बहुत प्रेम होता है, इसलिए इसकी पूंछ पर कपड़ा लपेटकर तेल डालकर आग लगा दी जाए। राक्षसों ने पूंछ में कपड़ा लपेटना शुरू किया, परंतु हनुमान जी ने अपनी पूंछ इतनी बढ़ाई कि लंका का सारा तेल और कपड़ा समाप्त हो गया। जैसे ही पूंछ में आग लगाई गई, हनुमान जी ने अति सूक्ष्म रूप बनाकर बंधन काट लिए और स्वर्ण शिखरों पर कूद पड़े।
॥ दोहा 35 एवं चौपाई ॥
हरि प्रेरित तेहि अवसर चले मरुत उनचास। अट्टहास करि गर्जा कपि बढ़ि लाग्यो अकास॥ देह बिसाल परम हरुआरी। मंदिर ते मंदिर चढ़ि धारी॥ झरहिं मसि निगलति जरहिं घरा। लंका जरति देखि सुर डरा॥
उलटि पलटि लंका सब जारी। कूदि परा पुनि सिंधु मंझारी॥ पूँछ बुझाइ खोइ श्रम कपि पुनि सीता पहिं गयऊ॥ ३५ ॥
हिंदी भावार्थ: भगवान की प्रेरणा से उनचासों पवन प्रचंड वेग से बहने लगे। हनुमान जी ने अट्टहास कर आकाश को छूने वाला रूप धारण किया और एक महल से दूसरे महल पर कूदकर पूरी लंका को धू-धू कर जला दिया। लंका दहन के पश्चात हनुमान जी ने समुद्र में कूदकर अपनी पूंछ की अग्नि बुझाई और सीता जी के दर्शन कर उनसे विदा मांगने पहुंचे।
॥ दोहा 40 एवं चौपाई ॥
मातु मोहि दीजै कछु चीन्हा। जैसे रघुनायक मोहि दीन्हा॥ चूड़ामणि उतारि तब दीन्हा। हरषित कपि गहि कर महुं लीन्हा॥ कहेहु तात अस मोर प्रनामा। सब बिधि पूरनकाम सुरामा॥ मास दिवस महुं नाथु न आवा। तौ पुनि मोहि जिअत नहिं पावा॥
कपिहि बिदा कीन्ह सीतहिं हरषि। नाइ चरन सिरु गयउ कपि धाव॥ सिंधु पार कपि आनि पुकारा। हरषे सब कपि भालु अपारा॥ ४० ॥
हिंदी भावार्थ: माता सीता ने अपने सिर से दिव्य चूड़ामणि उतारकर हनुमान जी को दी और कहा कि श्री राम से मेरा प्रणाम कहना और कहना कि यदि एक माह के भीतर प्रभु नहीं पधारे, तो वे मुझे जीवित नहीं पाएंगे। हनुमान जी ने माता के चरणों में प्रणाम किया और समुद्र लांघकर अपने वानर बंधुओं के पास लौट आए। हनुमान जी को सकुशल देखकर सभी वानर-भालू आनंद से झूम उठे।
🕉️ सर्ग ६: विभीषण शरणागति एवं समुद्र विनय (दोहा ५० - ६०)
॥ दोहा 50 एवं चौपाई ॥
चूड़ामणि प्रभु कर महुं दीन्हा। लोचन नीर राम भरि लीन्हा॥ कहहु कपि सीतहि कैसि कुसलाता। अहह निसाचर निकर सताता॥ हनूमान कह सुनहु रघुराई। सीता कर दुख कह्यो न जाई॥ राम नाम जपि दिवस बिहावै। नयनन्ह नीर प्रेम धार बहावै॥
तात बचन सुनि बिकल रघुराई। चले तुरत कपि सेन बुलाई॥ चलेउ राम भालु कपि जोधा। सिंधु तीर सब कीन्ह निरोधा॥ ५० ॥
हिंदी भावार्थ: हनुमान जी ने प्रभु श्री राम को माता जानकी की चूड़ामणि सौंपी। चूड़ामणि देखकर श्री राम के नेत्रों में जल भर आया। हनुमान जी ने माता का संदेश और उनका विरह-दुःख प्रभु को सुनाया। यह सुनकर श्री राम ने तुरंत सुग्रीव को सेना सजाने की आज्ञा दी और वानर-भालुओं की विशाल सेना समुद्र तट पर आ पहुंची।
॥ दोहा 58 एवं चौपाई ॥
लछिमन बान सरासन आनू। सोषौं बारिधि बिसिख कृसानू॥ सठ सन बिनय कुटिल सन प्रीती। सहज कृपन सन सुंदर नीती॥ ममता रत सन ग्यान कहानी। अति लोभी सन बिरति बखानी॥ क्रोधिहि सम कामिहि हरिकथा। ऊसर बीज बए फल जथा॥
अस कहि रघुपति चाप चढ़ायो। यह मत लछिमन के मन भायो॥ संधान्यो प्रभु बिसिख कराला। उठी उदधि उर अंतर ज्वाला॥ ५८ ॥
हिंदी भावार्थ: तीन दिन तक समुद्र से विनय करने पर भी जब समुद्र ने मार्ग नहीं दिया, तब श्री राम जी ने लक्ष्मण जी से कहा—'हे लक्ष्मण! धनुष-बाण लाओ, मैं अग्निबाण से इस समुद्र को सुखा दूंगा। मूर्ख से विनय, कुटिल से प्रीति, कंजूस से सुंदर नीति और क्रोधी से शांति की बात करना ऊसर भूमि में बीज बोने के समान व्यर्थ है।' ऐसा कहकर प्रभु ने जैसे ही धनुष पर बाण चढ़ाया, समुद्र के हृदय में प्रलयंकारी ज्वाला भड़क उठी।
॥ दोहा 60 एवं चौपाई ॥
त्राहि माम् त्राहि माम् पुकारत उदधि आवा। कनक थार भरि मनि गन ल्यावा॥ सभय चरन गहि बिनती कीन्हा। नाथ मोहि छमिहहु अपराध प्रवीणा॥ नल नील कपि द्वौ भाई। लरिकाईं रिषि आसिस पाई॥ तिन्ह कें परस किएं गिरि भारी। तरिहहिं जलधि प्रताप तुम्हारी॥
सकल सुमंगल दायक रघुनायक गुन गान। सादर सुनहिं ते तरहिं भव सिंधु बिना जलजान॥ ६० ॥ ॥ इति श्रीमद्रामचरितमानसे पंचमः सोपानः सुंदरकांडः समाप्तः ॥
हिंदी भावार्थ: भयभीत होकर समुद्र ब्राह्मण रूप में सोने के थाल में मणियां भरकर प्रकट हुआ और प्रभु के चरणों में गिरकर क्षमा मांगने लगा। समुद्र ने कहा—'हे नाथ! आपकी सेना में नल और नील नामक दो वानर भाई हैं, जिन्हें बाल्यकाल में ऋषियों का वरदान प्राप्त है। उनके स्पर्श से भारी से भारी पर्वत भी जल पर तैरने लगेंगे।' इस प्रकार समुद्र पर सेतु निर्माण का मार्ग प्रशस्त हुआ। गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं—श्री रघुनाथ जी के गुणों का गान समस्त सुंदर मंगलों का दाता है। जो मनुष्य आदरपूर्वक इसे सुनते और गाते हैं, वे संसार रूपी भवसागर को बिना किसी जहाज के ही सहज पार कर जाते हैं।

❓ सुंदरकांड पाठ से संबंधित मुख्य प्रश्नोत्तर (FAQs)

1. सुंदरकांड का पाठ कब करना सबसे फलदायी होता है?

सुंदरकांड का पाठ मंगलवार, शनिवार, पूर्णिमा अथवा किसी भी संकट व मानसिक तनाव के समय करना अमोघ फलदायी होता है। संध्याकाल में घी या चमेली के तेल का दीपक जलाकर इसका सस्वर पाठ सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

2. सुंदरकांड के पाठ से क्या लाभ होते हैं?

श्री रामचरितमानस का सुंदरकांड एकमात्र ऐसा अध्याय है जिसमें श्री हनुमान जी की असीम विजय, पराक्रम और सामर्थ्य का वर्णन है। इसके नित्य पाठ से शनि की साढ़े साती, भूत-प्रेत भय, असाध्य रोग और गृह-क्लेश से मुक्ति मिलती है और अदम्य इच्छाशक्ति जाग्रत होती है।

3. क्या संपूर्ण सुंदरकांड पाठ के बीच में विश्राम लिया जा सकता है?

प्रभु वंदन पर 'बुकमार्क' सुविधा उपलब्ध है। यदि समय के अभाव में एक बार में संपूर्ण पाठ संभव न हो, तो आप जिस दोहे पर रुकें वहाँ बुकमार्क कर लें और अगली बार वहीं से अपना पाठ प्रारंभ कर सकते हैं।