माँ गंगा पूजन एवं गंगा दशहरा / पूर्णिमा दीपदान विधि
Maa Ganga Pooja & Deepdaan Vidhi
शिव की जटाओं से अवतरित होकर समस्त जगत का उद्धार करने वाली पतितपावनी माँ गंगा की आराधना जीवन के समस्त पापों, संतापों और पूर्वजन्म के दोषों का तत्काल शमन करती है।
🕉️ ॥ पूर्व तैयारी एवं सामग्री व्यवस्था ॥
आवश्यक पूजन सामग्री:
विधि: शुद्ध गंगाजल (पात्र में), माँ गंगा का चित्र या कलश, गाय का कच्चा दूध, श्वेत पुष्प व माला, रोली, अक्षत, धूप, घी के मिट्टी के दीये (या पत्ते के दोने में दीप), बताशा, मौसमी फल, लाल चुनरी।
📿 मंत्र: ॐ नमो गंगायै विश्वरूपिण्यै नारायण्यै नमो नमः। ॐ गां गङ्गायै नमः॥
🕉️ ॥ चरण १: तीर्थ स्नान अथवा घर पर गंगाजल स्नान ॥
पावन स्नान विधान:
विधि: गंगा तट पर या घर पर सामान्य जल में गंगाजल मिलाकर स्नान करें। स्नान करते समय माँ गंगा के पवित्र नामों का स्मरण करें।
📿 मंत्र: गंगे च यमुने चैव गोदावरि सरस्वति। नर्मदे सिन्धु कावेरि जलेऽस्मिन् संनिधिं कुरु॥
🕉️ ॥ चरण २: कलश स्थापना एवं दुग्ध अभिषेक ॥
कलश पूजन व दुग्ध धारा:
विधि: तांबे या पीतल के कलश में गंगाजल भरकर उस पर लाल चुनरी और नारियल रखें। गंगा तट पर हों तो सीधे गंगा की धारा में और घर पर हों तो कलश पर कच्चा दूध अर्पित करें।
📿 मंत्र: ॐ भागीरथ्यै विद्महे शिवप्रियायै धीमहि तन्नो गंगा प्रचोदयात्॥
🕉️ ॥ चरण ३: श्वेत पुष्प एवं चुनरी समर्पण ॥
वस्त्र व पुष्प अर्पण:
विधि: माँ गंगा को लाल या पीली चुनरी अर्पित करें। श्वेत कमल, मोगरा या चमेली के सुगंधित पुष्प चढ़ाएं। रोली और अक्षत से तिलक करें।
📿 मंत्र: गाङ्गं वारि मनोहारि मुरारिचरणच्युतम्। त्रिपुरारिशिरश्चारि पापहारि पुनातु माम्॥
🕉️ ॥ चरण ४: नदी या जलपात्र में दीपदान (१०८ दीप) ॥
संध्याकालीन दीपदान:
विधि: संध्या के समय मिट्टी के दीयों या पत्तों के दोनों में घी की बत्ती जलाकर फूल रखें और माँ गंगा की जलधारा में (या घर के जलपात्र के समीप) दीपदान करें।
📿 मंत्र: ॐ दीपज्योतिः परब्रह्म दीपज्योतिर्जनार्दनः। दीपो हरतु मे पापं दीपज्योतिर्नमोऽस्तु ते॥
🕉️ ॥ चरण ५: गंगा स्तोत्र पाठ एवं गंगा आरती ॥
आरती एवं पावन स्तुति:
विधि: आदि शंकराचार्य कृत गंगा स्तोत्र का पाठ करें। कर्पूर और घी के बड़े दीपक से 'ॐ जय गंगे माता' की आरती उतारें और आचमन करें।
📿 मंत्र: देवि सुरेश्वरि भगवति गङ्गे त्रिभुवनतारिणि तरलतरङ्गे। शङ्करमौलिविहारिणि विमले मम मतिरास्तां तव पदकमले॥
🌸 पावन भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व:
माँ गंगा केवल एक नदी नहीं, साक्षात् मोक्षदायिनी भगवती हैं। उनकी आराधना से मनुष्य के शारीरिक, मानसिक और आत्मिक तीनों प्रकार के ताप शांत होकर परम शांति प्राप्त होती है।
💡 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
❓ गंगा दशहरा किस तिथि को मनाया जाता है?
ज्येष्ठ शुक्ल पक्ष की दशमी तिथि को माँ गंगा का पृथ्वी पर अवतरण हुआ था, जिसे गंगा दशहरा के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास से मनाया जाता है।
❓ गंगाजल कभी खराब क्यों नहीं होता?
धार्मिक रूप से गंगाजल में साक्षात् अमृत तत्व और वैज्ञानिक रूप से इसमें प्रचुर मात्रा में बैक्टेरियोफेज वायरस होते हैं जो जल को सदैव शुद्ध रखते हैं।


