श्री शीतला चालीसा
Shri Sheetla Chalisa
चेचक, ज्वर, त्वचा रोग और संक्रामक व्याधियों का शमन कर जीवन में शीतलता और उत्तम स्वास्थ्य प्रदान करने वाली भगवती शीतला की यह चालीसा अत्यंत फलदायी है।
जय जय माता शीतला, तुम ही धरो न रूप।
शीतल जल से सींचती, हरती ताप अरूप॥
गर्दभ वाहन सोहता, सूप झाड़ू कर माहिं।
नीम पत्र गल शोभते, संकट सब मिट जाहिं॥
जय जय शीतला सुखदानी। जग जननी कल्याणी भवानी॥
शीतल रूप तुम्हारा माई। दाह ज्वर सब दूर नसाई॥
गर्दभ पर आसन अति प्यारा। कर में कलश अमृत की धारा॥
मार्जनी हाथ में लिए विराजत। पाप ताप सब दूर भगावत॥
चेचक ज्वर और फोड़े फुंसी। शरण पड़े मिट जावे विपसी॥
शीतला सप्तमी अष्टमी मेला। उमड़त भक्तन का शुभ रेला॥
बासी भोग लगावे कोई। रोग शोक घर में नहिं होई॥
ठंडा भोजन मातु सुहावे। श्रद्धा से जो चालीसा गावे॥
बालक वृद्ध सब सुखी रहाहीं। मातु तुम्हारी शरण जो आहीं॥
निर्मल काया सुंदर पावे। घर-आँगन आनंद बरसावे॥
वन्दन बारम्बार है, मातु शीतला तोहि।
आरोग्य सुख दीजिये, कृपा दृष्टि करि मोहि॥
🌸 पावन भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व:
माँ शीतला आरोग्य की देवी हैं। उनके हाथ में झाड़ू (स्वच्छता का प्रतीक), सूप (सार ग्रहण करने का प्रतीक), कलश (शीतल जल) और नीम की पत्तियां (कीटाणुनाशक औषधि) सुशोभित हैं। शीतला अष्टमी पर बासोड़ा (शीतल भोग) अर्पित कर चालीसा पढ़ने से परिवार संक्रामक रोगों से सुरक्षित रहता है।
💡 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
❓ शीतला चालीसा का विशेष महत्व कब होता है?
चैत्र मास के कृष्ण पक्ष की शीतला सप्तमी व अष्टमी (बसोड़ा पर्व) पर इसका पाठ विशेष रूप से किया जाता है।
❓ माँ शीतला को बासी भोजन का भोग क्यों लगाया जाता है?
ऋतु परिवर्तन के समय अग्नि के उपयोग को विराम देकर शीतल और सुपाच्य जीवनशैली अपनाने तथा स्वच्छता का संदेश देने हेतु बासी (शीतल) भोजन का भोग लगाया जाता है।

