श्री गंगा चालीसा
Shri Ganga Chalisa
भगवान शिव की जटाओं से धरती पर अवतरित होकर राजा सगर के साठ हजार पुत्रों का उद्धार करने वाली परम पावन माँ गंगा की यह चालीसा पाप-ताप विनाशिनी है।
जय जय जय जग पावनी, जय सुरसरि सुख दैन।
भव भय हरनी अमिय सुख, भरहु मुदित मन नैन॥
विष्णु पदाम्बुज प्रकटी, शिव जटा में वास।
भागीरथ तप से भई, प्रकटी भारत खास॥
जय जय सुरसरि सुर सुखदाता। त्रिभुवन तारक गंगे माता॥
हिमगिरि ते तुम प्रकटी आई। भागीरथ की कीर्ति बढ़ाई॥
शिव की जटा में वेग समेटा। चरण कमल प्रभु हर के भेटा॥
ब्रह्मा जी के कमंडल वासिनी। विष्णु पादपद्म विलासिनी॥
सगर सुतन को तारा तुमने। कपिल मुनि संशय हरने॥
हरिद्वार प्रयाग काशी धारा। धन्य धन्य सब जगत पसारा॥
जल शीतल अमृत सम पावन। दर्शन मात्र करत मन भावन॥
जो जन नित्य स्नान कराहीं। ताके पातक सब मिट जाहीं॥
अस्थि विसर्जित जो जन कीन्हा। ताको परम मोक्ष पद दीन्हा॥
गंगा जल घर माहिं रखावे। भूत प्रेत भय निकट न आवे॥
गंगा दशहरा पर्व सुहावन। जो नर गाये चालीसा पावन॥
कोटि जनम के संताप नसावे। अंत समय वैकुंठ सिधावे॥
मात गंगे की कृपा से, कटत पाप संताप।
अमृतमय जीवन बने, मिटे त्रिविध भव ताप॥
🌸 पावन भावार्थ एवं आध्यात्मिक महत्व:
भगवान विष्णु के चरणों से उत्पन्न, ब्रह्मा जी के कमंडल में वास करने वाली और भगवान शिव की जटाओं से धरती पर अवतरित माँ गंगा की चालीसा समस्त त्रिविध तापों (आधि, व्याधि, उपाधि) का नाश करती है। गंगाजल का स्पर्श और स्मरण मात्र से आत्मा पवित्र हो जाती है।
💡 अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न (FAQs)
❓ गंगा चालीसा का पाठ कब करना चाहिए?
प्रतिदिन प्रातः स्नान के समय, गंगा दशहरा और मकर संक्रांति जैसे पावन पर्वों पर गंगा चालीसा का पाठ विशेष फलदायी है।
❓ गंगाजल घर में रखने का क्या महत्व है?
सनातन धर्म में गंगाजल को अमृततुल्य माना गया है, इसे घर के ईशान कोण में रखने से वास्तुदोष और नकारात्मक शक्तियां समाप्त होती हैं।


